रक्षाबंधन
रक्षाबंधन
भविष्योत्तर पुराण एवं मदनरत्न के अनुसार रक्षाबंधन श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को होता है। इसमें अपराह्न व्यापिनी तिथि ली जाती है यानि जिस दिन पूर्णिमा १८ घटी से २४ घटी तक या इससे अधिक समय तक व्याप्त रहे उस दिन रक्षाबंधन पर्व मनाना चाहिए। यदि ऐसी स्थिति दो दिन हो तो पहले दिन रक्षाबंधन सूत्र बांधना चाहिए।
स्मरण रहे कि उस समय भद्राकाल नहीं होना चाहिए।
“भद्रायां द्वे न कर्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी तथा”
अपराह्न का समय रक्षा बन्धन के लिये अधिक उपयुक्त माना जाता है जो कि हिन्दु समय गणना के अनुसार दोपहर के बाद का समय है। यदि अपराह्न का समय भद्रा आदि की वजह से उपयुक्त नहीं है तो प्रदोष काल का समय भी रक्षा बन्धन के संस्कार के लिये उपयुक्त माना जाता है।
भद्रा का समय रक्षा बन्धन के लिये निषिद्ध माना जाता है। हिन्दु मान्यताओं के अनुसार सभी शुभ कार्यों के लिए भद्रा का त्याग किया जाना चाहिये। सभी हिन्दु ग्रन्थ और पुराण, विशेषतः व्रतराज, भद्रा समाप्त होने के पश्चात रक्षा बन्धन विधि करने की सलाह देते हैं।
भद्रा पूर्णिमा तिथि के पूर्व-अर्ध भाग में व्याप्त रहती है। अतः भद्रा समाप्त होने के बाद ही रक्षा बन्धन किया जाना चाहिये। उत्तर भारत में ज्यादातर परिवारों में सुबह के समय रक्षा बन्धन किया जाता है जो कि भद्रा व्याप्त होने के कारण अशुभ समय भी हो सकता है। इसीलिये जब प्रातःकाल भद्रा व्याप्त हो तब भद्रा समाप्त होने तक रक्षा बन्धन नहीं किया जाना चाहिये।
कुछ विद्वानों का ऐसा मानना है कि प्रातःकाल में, भद्रा मुख को त्याग कर, भद्रा पूँछ के दौरान रक्षा बन्धन किया जा सकता है।
॥ श्रीरस्तु ॥
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«« संकलनकर्ता »»
पंडित हर्षित द्विवेदी
(‘हरि हर हरात्मक’ ज्योतिष)
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