शीतला अष्टमी त्यौहार
शीतला अष्टमी
व्रतमात्रेऽष्टमी कृष्णा पूर्वा शुक्लाष्टमी परा (माधव)
अर्थात् – शीतला अष्टमी कृष्ण पक्ष में होने के कारण पूर्व विद्धा (सप्तमी विद्धा) ली जाती है। इस दिन शीतला माता का व्रत एवं शीतल अन्न (पहले से पकाए हुए भोजन) का भोग लगाया जाता है।
शीतला अष्टमी, जिसे बसौड़ा या शीतला सप्तमी भी कहा जाता है, एक महत्वपूर्ण हिंदू त्योहार है जो चैत्र कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन, शीतला माता की पूजा की जाती है, जो रोगों, विशेषकर चेचक, खसरा और त्वचा रोगों से बचाने वाली देवी मानी जाती हैं. शीतला अष्टमी का महत्व, धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों दृष्टिकोणों से है।
बासोड़ा पूजा, देवी शीतला को समर्पित पूजा है, जो होली के उपरान्त कृष्ण पक्ष अष्टमी पर की जाती है। बासोड़ा को शीतला अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। सामान्यतः यह पर्व होली के आठ दिन पश्चात् आता है, किन्तु अनेक लोग इसे होली के पश्चात् आने वाले प्रथम सोमवार अथवा शुक्रवार को मनाते हैं। शीतला अष्टमी उत्तर भारतीय राज्यों जैसे गुजरात, राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश में अधिक लोकप्रिय है।
बासोड़ा पर्व की परम्परा के अनुसार, इस दिन घरों में भोजन पकाने हेतु अग्नि नहीं जलायी जाती है। इसीलिये अधिकांश परिवार एक दिन पूर्व भोजन बनाते हैं तथा शीतला अष्टमी के दिन बासी भोजन का सेवन करते हैं। ऐसा माना जाता है कि, देवी शीतला चेचक, खसरा आदि रोगों को नियन्त्रित करती हैं तथा लोग इन रोगों के प्रकोप से सुरक्षा हेतु उनकी पूजा-आराधना करते हैं।
गुजरात में, बासोड़ा के समान ही एक पर्व कृष्ण जन्माष्टमी से ठीक एक दिन पूर्व मनाया जाता है तथा इसे शीतला सातम के नाम से जाना जाता है। शीतला सातम भी देवी शीतला को समर्पित है एवं शीतला सातम के दिन भी किसी प्रकार का ताजा भोजन नहीं पकाया जाता है।
॥ श्रीरस्तु ॥
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«« संकलनकर्ता »»
पंडित हर्षित द्विवेदी
(‘हरि हर हरात्मक’ ज्योतिष)
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