कज्जली तृतीया (श्रावणी तीज)
कज्जली तृतीया (श्रावण तीज)
तृतीया श्रावणे कृष्णा, या स्याच्छ्रवण संयुता।
तस्यां सम्पूज्य गोविन्दं, तुष्टिमग्रयामवाप्नुयात्॥ (हेमाद्री एवं विष्णुधर्मोत्तर)
अर्थात् – श्रावण कृष्ण तृतीया को श्रवण नक्षत्र के योग में विष्णू पूजन-व्रत किया जाता है। इसमें परविद्धा तिथि ग्राहय होती है पर तिथि से तात्पर्य चतुर्थी तिथि है।
तीज का त्यौहार भारत के कोने-कोने में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। यह त्यौहार भारत के उत्तरी क्षेत्र में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। सावन का आगमन ही इस त्यौहार के आने की आहट सुन्नाने लगता है समस्त सृष्टि सावन के अदभूत सौंदर्य में भिगी हुई सी नज़र आती है। सावन माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को श्रावणी तीज के रुप में मनाया जाता है. यह हरियाली तीज के नाम से भी जानी जाती है। यह त्यौहार मुख्यत: स्त्रियों का त्यौहार माना जाता है।
हाथों में रचि मेंहंदी की तरह ही प्रकृति पर भी हरियाली की चादर सी बिछ जाती इस न्यनाभिराम सौंदर्य को देखकर मन में स्वत: ही मधुर झनकार सी बजने लगती है और हृदय पुलकित होकर नाच उठता है, इस अवसर पर स्त्रियाँ गीत गाती हैं, झूला झूलती हैं और नाचती हैं। इस समय वर्षा ऋतु की बौछारें प्रकृति को पूर्ण रूप से भिगो देती हैं।
इस समय वर्ष अपने चरम पर होती है प्रकृति में हर तरफ हरियाली की चादर सी बिछी होती है और शायद इसी कारण से इस त्यौहार को हरियाली तीज कहा जाता है। सावन की तीज में महिलाएं व्रत रखती हैं इस व्रत को अविवाहित कन्याएं योग्य वर को पाने के लिए करती हैं तथा विवाहित महिलाएं अपने सुखी दांपत्य की चाहत के लिए करती हैं। देश के पूर्वी इलाकों में लोग इसे हरियाली तीज के नाम से जानते हैं। इस समय प्रकृति की इस छटा को देखकर मन पुलकित हो जाता है जगह-जगह झूले पड़ते हैं और स्त्रियों के समूह गीत गा-गाकर झूला झूलते है।
॥ श्रीरस्तु ॥
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«« संकलनकर्ता »»
पंडित हर्षित द्विवेदी
(‘हरि हर हरात्मक’ ज्योतिष)
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