वेदी मण्डल सहित विभिन्न देवी देवताओं के ध्यान आवाहन प्रार्थना हेतु संस्कृत एवं हिन्दी मन्त्रों का अनुपम संग्रह
सर्वदेव ध्यानम् आवाहनम् प्रार्थना मन्त्र संग्रह
॥ पुस्तक पूजन मन्त्र ॥
वन्दे वाग्भवमैन्दवात्मसदृशं
वेदादिविद्यागिरो।
भाषा देशसमुद्भवाः पशुगताश्
छन्दांसि सप्तस्वरान्॥
तालान्पञ्च महाध्वनीन् प्रकटयत्
आत्मप्रसारेण यत्त्।
बीजं पदवाक्य मानजनकं
श्रोमातृके ते परम्॥
सिन्दूर कान्तिममिता, भरणां त्रिनेत्रां।
विद्याक्षसूत्र मृगपोतवरं दधानाम्॥
पार्श्वस्थितां भगवतीमपि काञ्चनाङ्गी।
ध्यायेत कराब्जधृत पुस्तकवर्णमालाम्॥
॥ श्री सद् गुरुदेव ध्यानम् ॥
वन्दे गुरूणां चरणारविन्दे
सन्दर्शितस्वात्मसुखावबोधे।
निःश्रेयसे जाङ्गलीकायमाने
संसारहालाहलमोहशान्त्यै॥
ब्रह्मानदं परम सुखदं, केवलं ज्ञानमूर्ति
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं, तत्व मस्यादि लक्ष्यम्।
एकं नित्यं विमल मचलं, सर्व धीसाक्षि भुतं
भावातीतं त्रिगुण रहितं, सद् गुरुं तम् नमामिः॥
गुरुर्ब्रह्माः गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः॥
अखण्डमंण्डलाकारं, व्याप्तं येन चरा चरम।
तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्री गुरुवे नमः॥
अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन सलाकया।
चक्षुरुन्मीलतं येन, तस्मै श्री गुरुवे नमः॥
ध्यान मूलं गुरु मूर्ति, पूजा मूलं गुरु पदम्।
मंत्र मूलं गुरु वाक्यं मोक्ष मूलं गुरुकृपाः॥
नारायणं पद्मभवं वशिष्ठं,
शक्तिं च तत्पुत्र पराशरं च।
व्यासं शुकं गौडपदं महान्तं
गोविन्द योगीन्द्र मथास्य शिष्यम्॥
श्रीशंकराचार्य मथास्य पद्म
पादं च हस्तामलकम् च शिष्यान्।
तं त्रोटकं वार्तिक कार मन्यान्
अस्मद् गुरून्सन्तत मानतोस्मि॥
श्रुति स्मृति पुराणानाम्, आलयं करुणालयम्।
नमामि, भगवत्पाद, शंकरं लोक शंकरम्॥
शंकरं शंकराचार्य, केशवं बादरायणम्।
सूत्र भास्य कृतौ वन्दे, भगवन्तौ पुनः पुनः॥
प्रातः शिरसि शुक्लब्जे, द्विनेत्रं द्विभुजम गुरुम्।
प्रसन्न वदनं शान्तं स्मरेत, तन्नाम पूर्वकम्॥
॥ श्री गणेशाम्बिका ध्यानम् ॥
ॐ गजाननं भूतगणादिसेवितं,
कपित्थजम्बू फलचारु भक्षणम्।
उमासुतं शोकविनाशकारकं,
नमामि विघ्नेश्वर पादपङ्कजम्॥
(अथवा)
ॐ दधानं भृंगाली, मनिश ममले गंड़ युगले।
ददानं सर्वार्थान, निज चरण सेवा सुकृतिने॥
दयाधारं सारं, निखिल निगमाना मनुदिनम्।
गजास्यं स्मेरास्यं, तमिह कलये चित्त निलये॥
(अथवा)
ॐ शिवांके क्रीडन्तम्
परशु वरहस्तं करि मुखम्।
विनाशी विघ्नानाम्
सकल दुःखहारी सुखकरम॥
प्रकाशी विद्यानां
सकल सुखराशी सुख करम।
चरण वन्दौ स्वामी
मुनिवर नमामी शिव सुतम्॥
(अथवा)
सुराधीशवन्द्यं भवानीशवन्द्यं,
कला कोटि युक्तं गुणालीव भुक्तम्।
महाराजमेकं परित्रातु लोकं
स्फुरच्चन्द्र खण्डं भजे वक्रतुण्डम्॥
(अथवा)
हस्तीन्द्रानन मिन्दु चूड मरुण्
छायं त्रिनेत्रं रसा
दाश्लिष्टं प्रियया सपद्म करया
स्वाङ्कस्थया संततम्।
बीजा पूर गदा धनुस्त्रि शिखयुक्
चक्राब्ज पाशोत्पलः
व्रीह्य ग्रस्व विषाण रत्न कलशान्
हस्तैर्वहन्तं भजे॥
(अथवा)
ॐ खर्वं स्थूलतनुं गजेन्द्र वन्दनम्
लम्बोदरं सुंदरम्।
प्रस्यन्दन् मदगन्ध लुब्ध् मधुप
व्यालोल गंडस्थलम्॥
दन्ताघात विदारि तारि रूधिरैः
सिन्दूर शोभाकरम्।
वन्दे शैल सुतासुतं गणपतिं
सिद्धिप्रदम् कामदम्॥
(अथवा)
ॐ शिव तनय वरिष्ठं सर्व कल्याण मूर्ति
परशु कमल हस्तं शोभितं मोदकेन।
अरुण कुसुम मालाम् व्याल यज्ञोपवीतम्
मम हृदय निवासं श्री गणेशं नमामि॥
(अथवा)
ॐ गजवदनमचिन्त्यं तीक्ष्णदंष्ट्रं
त्रिनेत्रं वृहदुदरमशेषं भूतिराजं पुराणम्।
अमर वर सुपूज्यं रक्तवर्णं सुरेशं
पशुपति सुतमीशं विघ्नराजं नमामि॥
(अथवा)
ॐ अविरल मदधारा धौतकुम्भः शरण्यः
फणि वर वृत गात्रः सिद्ध साध्यादि वन्द्यः।
त्रिभुवन जन विघ्नध्वान्त विध्वं सदक्षो
वितरतु गजवक्त्र: सन्ततं मङ्गलं वः॥
(अथवा)
ॐ लम्बोदरं परम सुन्दरमेकदन्तं
पीताम्बरं त्रिनयनं परमं पवित्रम्।
उद्यद्दिवाकर निभोज्ज्वल कान्ति कान्तं
विध्नेश्वरं सकल विघ्नहरं नमामि॥
(अथवा)
ॐ उद्यद्दिनेश्वर रुचिं निज हस्त पद्यैः,
पाशांङ्कुशाऽ भयवरान्दधतं गजास्याम्।
रक्ताम्बरं सकलदुःखहरं गणेशं
ध्यायेत्, प्रसन्नमखिला भरणाभिरामम्॥
(अथवा)
ॐ अति मंडल मंडित गंड्तलम्
तिलकीकृत कोमल चंद्रकलम।
करघात विदारित बैरि बलम्
प्रणमामि गणाधिपतिम् जटिलम्॥
(अथवा)
ॐ सिन्दूर-वर्णं द्वि-भुजं गणेशं
लम्बोदरं पद्म-दले निविष्टम्।
ब्रह्मादि-देवैः परि-सेव्यमानं
सिद्धैर्युतं तं प्रणामि देवम्॥
(अथवा)
ॐ सम्पूजकानां परिपालकानां
जितेन्द्रियाणां च तपोधनानाम्।
देशस्य राष्ट्रस्य कुलस्य राज्ञः
करोतु शांतिं भगवान गणेशाः॥
(अथवा)
ॐ नमो नमः सुरवर पूजितांघ्रये
नमो नमः निरुपम् मङ्गलात्मने।
नमो नमः विपुल पदैक सिद्धयै
नमो नमः करिकलभाननाय ते॥
॥ भगवती श्री गौरी ध्यानम् ॥
ॐ मुखे ते ताम्बूलं नयन युगले कज्जल कला।
ललाटे काश्मीरं विलसति गले मौक्तिक लता॥
स्फुरत्काञ्ची शाटी पृथु कटि तटे हाटकमयी।
भजामि त्वां गौरीं नगपति किशोरीम् विरतम्॥
(अथवा)
चाञ्चल्यारुण लोचनाञ्चित कृपां
चन्द्रार्क चूडामाणिं
चारुस्मेरमुखां चराचरजगत्
संरक्षणीं सत्पदाम्।
चञ्च च्चम्पक नासिका ग्रविलसन्
मुक्तामणी रञ्जितां
श्रीशैलस्थल वासिनीं भगवती
श्री मातरं भावये॥
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्॥
॥ श्रीगणेशाम्बिका आवाहनम् ॥
ॐ गॖणाना॑न्त्वा गॖणप॑ति ᳬ हवामहे प्प्रिॖयाणा॑न्त्वा प्प्रिॖयप॑ति ᳬ हवामहे निधीॖनान्त्वा॑ निधिॖपति॑ ᳬ हवामहे व्वसोमम। आहम॑जानिगर्ब्भॖधमात्त्वम॑जासि गर्ब्भॖधम्॥
ॐ अम्बे॒ऽअम्बि॒केम्बा॑ळिके॒ नमा॑नयति॒ कश्च॒न।
सस॑स्त्यश्श्व॒कः सुभ॑द्रिका काम्पीळवा॒सिनी॑म्॥
हे हेरम्ब ! त्वमेतह्यहि ह्य अम्बिका अम्बकात्मजा।
सिद्धिबुद्धिपते ! त्र्यक्ष ! लक्षलाभपितुः पितः॥
नागास्यं नागहारं त्वां गणराजं चतुर्भुजम् ।
भूषितं स्वायुधैर्दिव्यैः पाशाङ्कुशपरश्वधैः॥
आवाहयामि पूजार्थं रक्षार्थ च मम क्रतोः।
इहाऽगत्य गृहाण त्वं पूजां यागं च रक्ष मे॥
एह्येहि हेरम्ब महेशपुत्र समस्तविघ्नौघविनाशदक्ष
माङ्गल्यपूजाप्रथमप्रधान गृहाण पूजां भगवन् नमस्ते॥
श्रीगणेश हिन्दी ध्यान
देवों के प्रिय विघ्ननियन्ता
लम्बोदर भव-भय हारी।
गिरिजानन्दन देव गजानन
यज्ञ-विभूषित श्रुतिधारी॥
मंगलकारी दुःख-विदारी
तेजोमय जय वरदायक।
बार-बार जय नमस्कार
स्वीकार करो हे गणनायक॥
देव आइये यहाँ बैठिये
पूजा को करिये स्वीकार।
भूर्भुवः स्वः सुख समृद्धि के
खोल दीजिये मंगल द्वार॥
गणनायक वर बुद्धि विधायक
सदा सहायक भय-भंजन।
प्रियपति, अति प्रिय वस्तु प्रदायक
जगत्राता जन-मन-रंजन॥
निधिपति, नव-निधियों के दाता
भाग्य-विधाता भव-भावन।
श्रद्धा से हम करते सादर
देव! आपका आवाहन॥
विश्व उदर में टिका आपके
विश्वरूप गणराज महान।
सर्व शक्ति संचारक तारक
दो अपने स्वरूप का ज्ञान॥
जय गणनायक सिद्धि विनायक
मंगलदायक मोक्ष प्रदाता।
हो तुम ही सबके शुभदायक
कष्ट हरो हे भाग्य विधाता॥
ऋद्धि सिद्धि के स्वामी तुम हो
पिता शुभलाभ के हो भवदाता।
माँ गौरी के साथ में आओ
दास तुम्हारा तुमको बुलाता॥
वन्दहु शम्भु भवानी के नन्दन
आनन्द कन्द निकन्द पति जै।
दीनन दायक ऋद्धि वा सिद्धि के
हे गणनायक मो पे पसीझै॥
बुद्धि के दाता गजानन आनन
मोरी कुबुद्धि सुबुद्धि कीजै।
मूषक वाहन छोड़ि विनायक
पूजा में आयके आसन लीजै॥
यजमान आप माता से निवेदन करें कि हे मां मैं मूर्ख अज्ञानी आपकी पूजन की विधि से अंजान हूँ परन्तु आपके श्री चरणों में मेरी अपार श्रद्धा और आस्था है, मैं सद् भाव से आपका पूजन अर्चन प्रारम्भ करने जा रहा हूं, मेरी भावनाओं को समझते हुए मेरी पूजा को स्वीकार करें।
पूजा विधी न जानता, पर है श्रद्धा अपार।
विनती मेरी स्वीकारिये, हे माँ प्राणाधार॥
नमो नमो हे गौरी माता।
आप हो मेरी भाग्य विधाता॥
शरणागत न कभी घबराता।
गौरी उमा शंकरी माता॥
जय जय गिरिवर राज किशोरी।
जय महेश मुख चन्द चकोरी॥
जय गजबदन षडाननमाता।
जगत जननी दामिनी दुति गाता॥
नहिं तव आदि मध्य अवसाना।
अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना॥
भव भव विभव पराभव कारिनि।
विश्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि॥
सेवत तोहि सुलभ फल चारी।
बरदायनी पुरारी पिआरी॥
देव पूजि पद कमल तुम्हारे।
सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे॥
गौरी उमा गिरिजा सुखदायनि,
आदि भवानी महेश-पियारी।
सोहत भाल सुकोमल कुमकुम,
कानन कुण्डल की छवि न्यारी॥
कञ्चन-वर्ण सुवेश सजी कर,
त्रिशूल-धरा अरु खड्ग सँवारी।
आबहु मातु समेत सदानन्द,
हमारी बुद्धि करो उजियारी॥
आगच्छ देव देवेश, गौरीपुत्र विनायक।
तवपूजा करोमद्य, अत्रतिष्ठ परमेश्वर॥
हेमाद्रितनयां देवीं वरदां शङ्करप्रियाम्।
लम्बोदरस्य जननीं गौरीमावाहयाम्यहम्॥
॥ पूजनोपरांत श्रीगणेशाम्बिका प्रार्थना ॥
ॐ वन्दे देव गजाननं षडगुरूं वन्दे जगत्भूषणम।
वन्दे विघ्न विनायकं त्रिभुवनं वन्दे शुभं मङ्गलम्॥
वन्दे ईश उमासुतं कविवरं वन्दे सुलम्बोदरम्।
वन्दे सिद्धि विनायकं शिवसुतं कुर्यात्सदा मङ्गलम्॥
(अथवा)
ॐ निजैरोषधीष्तपर्यन्तम् कराद्यै
सुरौघान्कलाभिः सुधास्त्राविणीभिः।
दिनेशांशुसन्ताप हारं द्विजेशं
शशाङ्क स्वरूपं गणेशं नमामिः॥
(अथवा)
गणनायक ! दायक ! चारुफलं
वरदायक ! भक्त विपत्तहरम्।
सुरनायक साधक सिद्धिकरं
प्रणमामि विनायक विघ्नहरम्॥
(अथवा)
ॐ विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय
लम्बोदराय सकलाय जगद्धिताय।
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय
गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥
भक्तार्तिनाशनपराय गणेश्वराय
सर्वेश्वराय शुभदाय सुरेश्वराय।
विद्याधराय विकटाय च वामनाय
भक्तप्रसन्नवरदाय नमो नमस्ते॥
नमस्ते ब्रह्मरूपाय विष्णुरूपाय ते नमः
नमस्ते रुद्ररूपाय करिरूपाय ते नमः।
विश्वरूपस्वरूपाय नमस्ते ब्रह्मचारिणे
भक्तप्रियाय देवाय नमस्तुभ्यंविनायक॥
त्वां विघ्नशत्रु दलनेति च सुन्दरेति
भक्तप्रियेति सुखदेति फलप्रदेति।
विद्याप्रदेत्यघहरेति च ये स्तुवन्ति
तेभ्यो गणेश वरदो भव नित्यमेव॥
लम्बोदर नमस्तुभ्यं सततं मोदकप्रिय।
निर्विविघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
हरात्मज चतुर्बाहो वारणास्य महोदर।
प्रसन्नो भव मह्य त्वं गौरीपुत्र नमोस्तुते॥
त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या
विश्वस्य बीजं परमासि माया।
सम्मोहितं देवि समस्तमेतत्
त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः॥
सर्वेश्वरी सर्वमाता शर्वाणी हरवल्लभा सर्वज्ञा।
सिद्धिदा सिद्धा भव्या भाव्या भयापहा नमो नमस्ते॥
शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणिनमोऽस्तु॥
ॐ जय देवि नमस्तुभ्यं, जय भक्त वरप्रदे।
जय शंकर वामाङ्गे , मङ्गले सर्व मङ्गले॥
पुत्रान् देहि धनं देहि , सौभाग्यं देहि सुव्रते।
अन्याँश्च सर्व-कामांश्च , देहि देवि नमोऽस्तु ते॥
॥ श्री वरुण देव ध्यानं-आवाहनम् ॥
(कलश में चतुर्वेद, देवी-देवताओं का आवाहन)
घटे धान्या धारे कनक कलशा द्याक्षत युतैः।
तु पूर्वे श्री गंङ्गे विमल यमुना नीर निकरैः॥
चतुर्वेदै सांङ्गै सविधी सकलै देव दनुजैः।
स्थिते श्री नीरीशं वरुण मधुमा यामि शरणं॥
ॐ कला कला हि देवानां , दानवानां कला कला।
संगृह्य निर्मितो यस्मात् , कलशस्तेन कथ्यते॥
कलशस्य मुखे विष्णुः , कण्ठे रुद्रः समाश्रितः।
मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा , मध्ये मातृगणाः स्मृताः॥
कुक्षौ तु सागराः सर्वे , सप्तद्वीपा वसुन्धरा।
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः , सामवेदो ह्यथर्वणः॥
अङ्गैश्च सहिताः सर्वे , कलशं तु समाश्रिताः।
अत्र गायत्री सावित्री , शान्तिः पुष्टिकरी तथा॥
गङ्गे च यमुने चैव , गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धुकावेरि जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु॥
सर्वे समुद्राः सरितस्तीर्थानि जलदा नदाः।
आयान्तु मम शान्त्यर्थं दुरितक्षयकारकाः॥
श्री वरुण देव आवाहन हिन्दी
वास करहिं मुख में लक्ष्मीपति
कण्ठ में वास करें त्रिपुरारी।
मूल में ब्रह्मा निवास करें
मध्य में माताएं मंगलकारी॥
सागर द्वीप नदी वसुधा सब
तीरथ वेद भी है शुभकारी।
हे वरुण देव विराजो यहाँ
दुःख दूर करो विनती है हमारी॥
(अथवा)
तीर्थ सबै जल आनि भरे
घट भीतर देव सबै मिलि वासा।
गंग-तरंग उमंग भली
मन में प्रभु के गुण की परगासा॥
वारुण देव! पधारो यहाँ
मम पूजा को पूर्ण करो अभिलाषा।
शीश नवावत हों तुमको
करि वंदन राखहु मोरि सुदासा॥
(अथवा)
पावन कुम्भ सुहावन में,
जल के अधिराज पधारहु देव सदा।
अमृतौदधि को रस सींचत हो
जग में सब ओर प्रकाश सदा॥
करि के कलशार्चन वन्दत हैं
हम आजु सुभक्ति समेत मुदा।
वर देहु वरुणेश्वर आप हमें
कटिहैं भव-ताप मिटै सब बाधा॥
(अथवा)
नील-सरीर सुधारस-पूरन,
श्वेत-सिंहासन राजत है।
पाश-कछार लिये कर में,
छवि-सिंधु अनूपम छाजत है॥
‘वरुण’ दयानिधि वंदन है,
जग को सुख की नित थाती दे।
करि के जल की शुभ बृष्टि हरी,
सब जीवन को नव पाँती दे॥
॥ पूजनोपरांत श्री वरुण देव प्रार्थना ॥
वन्दे तीर्थमयं सदाशुचिकरं, वन्दे जलाधीश्वरं
वन्दे पाशकरं सुदा सुरवरं, वन्दे महाशोकहम्।
वन्दे सन्तत पाप पुञ्जशमनं, वन्दे सदा प्रीतिदं
पादः पृष्ठ समाश्रितञ्च वरुणं, वन्दे प्रतीची पतिम्॥
(अथवा)
नमो नमस्तेस्फटिकप्रभाय
सुश्वेतहाराय सुमङ्गलाय।
सुपाश हस्ताय झषासनाय
जलाधि नाथाय नमो नमस्ते॥
(अथवा)
निधानं धर्माणां, किमपि च विधानं नवमुदाम्
प्रधानं तीर्थानाम्, मलपरिधानं त्रिजगतः।
समाधानं बुद्धे, रथ खलु तिरो धानम धियाम्
श्रियामा धानं नः, परिहरतु तापं तव वपुः॥
(अथवा)
आश्रित्ययं भवति धन्यतरा प्रतीची।
रत्ना करत्व मुपयाती पयः समूहः॥
पाशच्श्रयस्य भव पाश विनाशकारी।
तं पाश धारिणमहं हृदिचिंतयामि॥
(अथवा)
हे पाश भूत वरूणनाथ जलेशदेव।
दीने दया मयि विधेहि सदा सुदेव॥
नातः परं किमपि प्रार्थयितव्य मस्ति।
पुष्पाञ्जलि ननु गृहाण सदा मदीयम्॥
(अथवा)
नमोस्तु यादीगण वारिधीनां।
सुसेव्यमान: स्वगणैश्च सार्धम्॥
जलाधिदेवो मम यज्ञ सिध्दयै।
गृहाण पूजां प्रणमामि नित्यम्॥
(अथवा)
आश्रित्ययं भवति धन्यतरा प्रतीची।
रत्ना करत्व मुपयाती पयः समूहः॥
पाशश्चयस्य भवपाशविनाशकारी।
तं पाश धारिणमहं हृदिचिंतयामि॥
देव दानव संवादे, मथ्य माने महोदधौ।
उत्पन्नोऽसि तदा कुम्भं,विधृतो विष्णुना स्वयम्॥
त्वत्तोये सर्व तीर्थानि, देवाः सर्वे त्वयि स्थिताः।
त्वयि तिष्ठन्ति भूतानि, त्वयि प्राणाः प्रतिष्ठिताः॥
शिवः स्वयं त्वमेवासि, विष्णुस्त्वं च प्रजापतिः।
आदित्या वसवो रुद्रा, विश्वेदेवाः सपैतृकाः॥
त्वयि तिष्ठन्ति सर्वेऽपि, यतः कामफलप्रदाः।
त्वत्प्रसादादिमां पूजां, कर्तुमीहे जलोद्भव॥
ॐ पाशपाणे नमस्तुभ्यं , पद्मिनीजीवनायक।
सांनिध्य कुरु मे देव प्रसन्नो भव सर्वदा॥
(ततो पुण्याहवाचनम् च कुर्यात्)
ॐ अपां पतये वरुण देवताः पुण्याहवाचनं यावत् तावत् त्वं सुस्थिरो भव॥
॥ श्री षोडशमातृका ध्यानं-आवाहनम् ॥
ॐ जयति वरद मूर्तिर्मङ्गलं मङ्गलानाम्।
जयति सकलवन्द्या भारती ब्रह्मस्वरूपा॥
जयति भुवनमाता चिन्मयी मोक्षरूपा।
तानुभय महेशो वाङ्मय शब्दरूपः॥
(अथवा)
ॐ गौरी पद्मा शची मेधा सावित्री विजया जया।
देवसेना स्वधा स्वाहा मातरो लोकमातरः॥
धृतिः पुष्टिस्तथा तुष्टिः आत्मनः कुलदेवता।
गणेशेनाधिका ह्येता वृद्धौ पूज्यास्तु षोडश॥
॥ श्री षोडशमातृका हिन्दी आवाहन ॥
गणनाथ के साथ उमा पदमा
शचि मेधा कृपा कर दीजे सहारा।
सावित्री विजया जया देवसेना
स्वधा करुणामयि माता की धारा॥
स्वाहा स्वथा लोकमाता धृति शुचि
पुष्टि व तुष्टि हरौ महि भारा।
आत्मनः कुलदेवता है षोडश
पूर्ण करो शुभ काम हमारा॥
(अथवा)
शीश झुका कुलदेवी तुम्हें
नित वंदति हूँ मन भाव सुहाई।
संकट मोचन मात हमारी
सदा तुम ही मम लाज बचाई॥
तेज-प्रताप बढ़ायौ सदा
कुल की तुम ही जगदंब सहाई।
दीन दयालु कृपा करिये
मम माथ रहै प्रभुता की छाई॥
आयुरारोग्यमैश्वर्यं ददध्वं मातरो मम।
निर्विघ्नं सर्वकार्येषु कुरुध्वं स गणाधिपाः॥
॥ पूजनोपरांत श्री षोडशमातृका प्रार्थना ॥
ब्राह्मणी कमलेंन्दु सौम्यवदना माहेश्वरी लीलया।
कौमारी रिपु दर्प्पनाशनकरी चक्रायुधा वैष्णवी॥
वाराही घनघोर घर्घरमुखी च ऐन्द्री च वज्रायुधा।
चामुण्डागणनाथरुद्रसहिता रक्षन्तु माममातरः॥
॥ श्री सप्तघृतमातृका ध्यानं-आवाहनम् ॥
या रक्ताम्बुज वासिनी विलासिनी
चण्डांशु तेजस्विनी।
या रक्ता रुधिराम्बरा हरिसखी
या श्री मनोल्हादिनी॥
या रत्नाकर मन्थनात्प्रगटिता
विष्णो स्वया गेहिनी।
सा मां पातु मनोरमा भगवती
लक्ष्मीश्च पद्मावती॥
ध्यायेत्लक्ष्मीं प्रहसित मुखीं, कोटिबालार्क भासाम्।
विद्युत् वर्णाम्बर वरधरां, भूषणाढ्यां सु शोभाम्॥
बीजा पूरं सरसिज युगं, बिभ्रतीम् स्वर्ण पात्रम्।
भर्त्रा युक्तां मुहुर भयदां, मह्य मप्यच्युत श्रीः॥
॥ श्री सप्तघृतमातृका हिन्दी आवाहन ॥
सातहुं विन्दु पे सातहुं माता
श्री लक्ष्मी धृति मेधा जी भी आओ।
स्वाहा सुप्रभा सरस्वती मातु
हमें भव सिंधु से पार लगाओ॥
है वसुधारा सदा वसुधा
तल पे करुणामयि धार बहाओ।
पूजा में आय सनाथ करो माँ
भक्त के माथे हाथ लगाओ॥
(अथवा)
राजत सीस मुकुट मणिके
छवि सुन्दरता की अनूपम माला।
कानन कुण्डल की झलकार
सुशोभित अंगन में छवि भाला॥
क्षीरधि-पुत्रि, दयामयि मातु
सदैव करो हम पे प्रतिपाळा।
दास पुकारत ‘श्री’ पद को,
हर लीजै विपत्ति सकल विकराळा॥
श्रीः लक्ष्मी, धृति, मेधा, स्वाहा, प्रज्ञा, सरस्वती।
मांगल्येषु प्रपूज्यन्ते सप्तैता घृतमातरः॥
॥ पूजनोपरांत श्री सप्तघृतमातृका प्रार्थना ॥
वन्दे लक्ष्मीं पर शिवमयीं
शुद्ध जाम्बूनदाभां।
तेजो रूपां कनक वसनां
सर्व भूषोज्ज्वलाङ्गीम्॥
बीजापूरं कनककलशं
हेमपद्यं दधानाम्।
आद्यां शक्तिं सकल जननीं
विष्णु वामाङ्क संस्थाम्॥
(अथवा)
या श्री: स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मी:
पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धि:।
श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा
तां त्वां नता: स्म परिपालय देवि विश्वम्॥
(अथवा)
या सा पद्मासनस्था विपुल कटि तटी
पद्म पत्रा यताक्षी
गम्भीरावर्तनाभिः स्तन भर नमिता
शुभ्र वस्त्रोत्त रीया।
या लक्ष्मीर्दिव्य रूपैर्मणि गण खचितैः
स्नापिता हेमकुम्भैः
सा नित्यं पद्महस्ता मम वसतु गृहे
सर्वमांङ्गल्ययुक्ता॥
भवानि त्वं महालक्ष्मीः सर्वकामप्रदायिनि।
सुपूजिता प्रसन्नस्यान्महालक्ष्मि! नमोऽस्तु ते॥
॥ श्री वास्तु ध्यानं-आवाहनम् ॥
वन्दे देववरञ्च वास्तु पुरुषं,
वन्दे च सिद्धिप्रदं
वन्दे सर्वसुराधिवास वपुषं
वन्दे च विश्वम्भरम्।
वन्दे शक्रवरप्रदश्च सततं
वन्दे धराधारिणं
वन्दे भक्तदयादलं सुखकरं
वास्तोष्पतिं दुःखहम्॥
(अथवा)
नौमीड्यतेभ्र वपुषे तडि दम्बराय
गुञ्जा वतंस परि पीक्षल सन्मुखाय।
वन्नस्रजे कवलवे त्रविषाण वेषुः
लक्ष्मश्रिये मृदुपते पशुपाङ्गजाय॥
(अथवा)
शशधर समवर्ण रत्नहार ज्वलाङ्गम्।
कनक मुकुट चूड़ं स्वर्ण यज्ञोपवीतम्॥
अभय वरद हस्तं सर्व लोकैकनाथम्।
तमिह भुवन रूपं वास्तुराजं नमामि॥
(अथवा)
शिख्यादि कामे खलुवास्तु देवा
गृहूणन्तु पुष्पांजलि मन्त्रशीघ्रम्।
पीडाहरा भव्यकरा विशाला
भवन्तु भूपालन तत् पराश्व॥
(अथवा)
जानामिनोऽर्चन विधि परमं क्षमध्वं।
लोकार्ति पुष्ज मतुलं क्षपयन्तु नित्यम्॥
शिख्यादिकाः सुविमलाः सुखमाकिरन्तु।
कुर्वन्तु दूरमनिशं दुरितान् समन्तात्॥
आगच्छ भगवन् वास्तु सर्व देवैर् अधिष्ठितः।
भगवन् कुरु कल्याणम् यज्ञेस्मिन् सन्निधौ भवः॥
॥ श्री वास्तुपुरुष हिन्दी आवाहन ॥
ग्रह नाथ करो वसुधा अब कृपा
सब दानव देवन्ह के रखवारे।
यज्ञ स्वरूप विचित्र है आपके
पाप का नाम मिटावन हारे॥
शान्ति समृद्धि बढे दिन रैन
मिले सुख चैन सुकीर्ति संवारे।
पूजा में आय के वास्तु प्रभो
अब पूर्ण करो सवकार्य हमारे॥
(अथवा)
गृह के कण-कण में बसे,
शुभ वास्तु सदा सुख-शांति करें।
दुख-दारिद और कलेश मिटा,
सब विघ्न-विनाशन काज करें।
ऋद्धि-सिद्धि के साथ रहें गणपति,
नित आनंद की बरसात करें।
हम वंदत हैं कर जोड़ तुम्हें,
यह वास्तु सदा ही आबाद करें।
(अथवा)
भूपर शयन करत प्रभु नित्य
सदा सुख शांति हमारे बसाओ।
वास्तु के दोष हरौ सबही
रिद्धि-सिद्धि की वृष्टि सदा बरसाओ॥
व्याधिन नाशन क्षेम सुपोषण
कीजै कृपा मम गेह सजाओ।
‘वास्तु-पुरुष’ दया करि आप
सुखी परिवार सदैव बनाओ॥
(अथवा)
सुख-शान्ति सदा गृह माहि रहै,
सब ओर सु-आनँद की सरसी।
गृह-वास्तु के दोष कटैं सब ही
प्रभु की नित कृपा सु-दृगैं बरसी॥
कर जोड़ि करौं प्रभु वन्दन मैं
नित पूजहिं वेद-रिचा सुर सी।
शुभता भरि के घर आँगन में
सुख-संपति देहिं सदा हरसी॥
श्री वास्तुपुरुष देवेश ! सर्वविघ्न विदारणः।
शान्तिं कुरु सुखं देहि, यज्ञेऽस्मिन् मम् सर्वदा॥
॥ पूजनोपरांत श्री वास्तुपुरुष प्रार्थना ॥
स्वर्णों पवीतेन सुशोभमानं
सर्वार्थ सिद्धस्तु निनादमेकम्।
त्रिलोक संचिन्तित पादपद्ममं
तं वास्तु राजं सततं नमामि॥
(अथवा)
ॐ नमो भगवते वास्तुपुरुषाय, महाबल पराक्रमाय, सर्वदेवाधि वासाश्रित शरीराय बह्मपुत्राय सकल ब्रह्माण्ड धारिण भू भारार्पित मस्तकाय पुरपत्तन प्रासाद गृहवापी सरःकूपादि संनिवेश सान्निध्य कराय, सर्व सिद्धिप्रदाय प्रसन्नवदनाय, विश्वम्भराय परमपुरुषाय चक्र शारङ्ग धराय वरदा भय हस्ताय वास्तोष्पते नमस्ते नमस्ते॥
नमस्ते वास्तु पुरुषाय भूशय्या भिरत प्रभो।
मद्गृहं धन धान्यादि समृद्धिम् कुरु सर्वदा॥
॥ श्री चतुषष्ठिःयोगिनी ध्यानं-आवाहनम् ॥
सृष्टौ या सर्गरूपा जगदवन विधौ
पालनी या च रौद्री
संहारे चापि यस्या जगदिदमखिलं
क्रीडनं या पराख्या।
पश्यन्ती मध्यमाथो तदनु भगवती
वैखरी वर्णरूपा
सास्मद्वाचं प्रसन्ना विधिहरिगिरिशा
राधितालंकरोतु॥
(अथवा)
खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः
शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्।
नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां
यामस्तौत्स्वपितेहरौकमलजो हन्तुंमधुंकैटभम्॥
ॐ अक्षस्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुष्कुण्डिकां
दण्डंशक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टांसुराभाजनम्।
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां
सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम्॥
ॐ घण्टाशूलहलानिशङ्खमुसले चक्रं धनुःसायकं
हस्ताब्जैर्दधतींघनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम्।
गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा-
पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्॥
॥ श्री चतुषष्ठिःयोगिनी हिन्दी आवाहन ॥
श्रीगणपति-गौरी-गिरीश-सदा,
शिव-शक्ति नमों पद-पद्म तुम्हारे।
चौंसठहुँ योगिनि माँ जगदम्ब,
करैं सब विघ्न विनाश हमारे॥
चंडि प्रचण्ड सुमुंड विनाशिनी,
शैल-सुता अरु भद्र कल्पारे।
दीन अधीन भजैं तुमको,
नित ‘नाथ’ कहैं भव-पार उतारै॥
(अथवा)
या जग में चौंसठ योगिनियाँ,
सब आदि भवानी के रूप बखानी।
कोटिन तेज विराजत भाल पे,
सिद्धि सुहावनि हैं वरदानी॥
दुष्ट विदारिनि भक्त उबारिनि,
शक्ति धरैं त्रिशूल सु पानी।
मातु हमारी सदा करुणा कर,
कीजै कृपा, हम हैं अज्ञानी॥
(अथवा)
ज्ञान की दायिनी बुद्धि प्रदायिनी
दूर करो मन का अंधियारा।
मूढ़ हूँ मैं असहाय हूँ मैं
जननी ममता का माँ दे दो सहारा॥
मातु कृपा करि कष्ट हरो
अपराध बिसार के आज हमारा।
देवी तुम्हारी करूँ विनती
शरणागत है यह पुत्र तुम्हारा॥
पूजयामि अऽहं देवि योगिनी परमेश्वरी।
योग अभ्यासेन संतुष्टा परं ध्यान समन्वित॥
॥ पूजनोपरांत श्री चतुषष्ठिःयोगिनी प्रार्थना ॥
या माया मधु-कैटभ-प्रमथनी,
या माहिषोन् मूलनी,
या धूम्रेक्षण-चण्ड-मुण्ड-दलनी,
या रक्त-बीजाशनी।
शक्तिः शुम्भ-निशुम्भ-दैत्य-मथनी,
या सिद्धि-लक्ष्मीः परा,
सा देवी नव-कोटि-मूर्ति-सहिता,
मां पातु विश्वेश्वरी॥
॥ श्री क्षेत्रपाल मण्डल ध्यानं-आवाहनम् ॥
यं यं यं यक्ष रूपं दश दिशि वदनं,
भूमि कम्पायमानं।
सं सं सं संहारमूर्ती शुभ मुकुट जटा,
शेखरम् चन्द्रबिम्बम्॥
दं दं दं दीर्घकायं विकृतनख मुखं,
चौर्ध्वरोयं करालं।
पं पं पं पापनाशं प्रणमत सततं,
भैरवं क्षेत्रपालम्॥
(अथवा)
ॐ कर कलित कपालः कुण्डली दण्डपाणिः
तरुण तिमिर नीलो व्याल यज्ञोपवीती।
क्रतु समय सपर्या विघ्न विच्छेद हेतुर्
जयति बटुकनाथः सिद्धिदः साधकानाम॥
॥ श्री क्षेत्रपाल मण्डल हिन्दी आवाहन ॥
कर कपाल शुभ सुन्दर राजे,
कुंडल कर्ण दण्ड कर साजे।
तरुण-तिमिर सम नील स्वरूपा,
व्याल-यज्ञ उपवीत अनूपा॥
विघ्ननाशि मखरक्षक पूरे,
साधु सिद्धिप्रद रण अति शूरे।
जय जय बटुकनाथ सिधिदायक,
कृपासिन्धु प्रभु भक्त सहायक॥
(अथवा)
सीस जटा सिरमौर विराजत
भाल विशाल लसै छवि भारी।
कानन कुण्डल की मकराकृति
सोहत सुन्दरता अति प्यारी।
क्षेत्रपाल दयानिधि पाहि सदा
मम रक्षक आप सदा हितकारी।
तेज प्रताप बढ़ै जग में
मम विघ्न हरौ सब संकट टारी॥
(अथवा)
यज्ञ की रक्षा करें जो सदा
काशी के कोतवाल कहाते।
भक्तों की कामना पूर्ण करें
माँ वैष्णों के घाम की शोभा बढ़ाते॥
कष्ट अमंगल दूर करो
कर जोरि के हम सब शीश नवाते।
हे अष्ट भैरव सुनो विनती
हो के आतुर भक्त तुम्हारे बुलाते॥
रौद्राय रौद्ररूपाय रणताण्डव साहिने।
महाविघ्नविनाशाय बं बटुकाय नमो नमः॥
॥ पूजनोपरांत श्री क्षेत्रपाल मण्डल प्रार्थना ॥
भीषणास्यं त्रिनयनमर्द्धचन्द्रं विभूषितम्।
स्फटिकाभं कंकणादि भूषाशत समायुतम्॥
अष्ट वर्षं वयस्कं च कुन्तलोल्लसितं भजे।
धारयन्तं दण्ड शूले भैरव्यादिसमायुतम्॥
(अथवा)
ॐ भैरवो भूत नाथश्च, भूतात्मा भूत भावन।
क्षेत्रज्ञः क्षेत्रपालश्च, क्षेत्रदः क्षत्रियो विराट्॥
श्मशान-वासी मासांशी, खर्पराशी स्मारन्त कृत।
रक्तपः पानपः सिद्धः, सिद्धिदः सिद्धि-सेवितः॥
कंकाल-काल शमनः, कला काष्ठा तनुः कविः।
त्रिनेत्रो बहु नेत्रश्च, तथा पिंगल लोचनः॥
शूल पाणि खड्गपाणिः, कंकालीधूम्र लोचनः।
अभीरू भैरवी नाथो, भूतपो योगिनी पतिः॥
॥ श्री नवग्रह ध्यानं-आवाहनम् ॥
वन्देऽहं च दिवाकरं ग्रहपतिं, वन्दे सुधांशुं विधुं,
वन्दे भूमिसुतं सुधाकरसुतं, वन्दे सुराणां गुरुम्॥
वन्दे दैत्यगुरु भृगोः सुतनयं, वन्दे शनिं सूर्यजं।
वन्दे सूर्य सुधांसुपीडमकरं, राहुञ्च केतुन्तथा॥
(अथवा)
आधारे प्रथमे सहस्रकिरणं,
ताराधवं स्वाश्रये।
माहेयं मणि पूरके हृदि बुधं ,
कण्ठे च वाचस्पतिम्॥
भ्रू मध्ये भृगुनन्दनं दिनमणेः ,
पुत्रं त्रिकूटस्थले।
नाडीमर्मसु राहु-केतु-गुलिकान्
न्नित्यं नमाम्य आयुषे॥
(अर्थात मूलाधार में सूर्य को, स्वाधिष्ठान में चंद्र को, मणिपुर में मंगल को, अनाहत में बुध को, विशुद्ध में बृहस्पति को, आज्ञा में शुक्र को, सहस्रार में शनैश्चर को, मर्मस्थानों में राहु-केतु और गुलिक को, मैं नमस्कार करता हूं। आप सभी नवग्रह देवता मुझे आयु प्रदान करें।)
॥ श्री नवग्रह हिन्दी आवाहन ॥
सूर्य हरें तम कष्ट करें कम
चन्द्र बड़े मुद मंगलकारी।
बुद्धि पवित्र करे बुध नित्य
बढ़ावत ज्ञान गुरु सुखकारी॥
शुचि जीवन शुक्र सदैव करें
शनि शोक हरें रवि दृष्टि निहारी।
राहु रहें गति केतु करें मति
दिव्य नवग्रह सोहत भारी।
(अथवा)
रवि सूर्य सुतीच्छन तेज भरे
सब चंद्र कलानिधि शीतल हैं।
शुभ मंगल मङ्गल रूप सदा
अरु बुद्ध सुबुद्धि के अंकुर हैं॥
गुरु बृहस्पति ज्ञान के सिंधु महा
भृगु शुक्र सुखी धन-ऐश्वर्य करें।
जय राहु-केतु अनिष्ट हरे
सब ग्रह मिल संकट दूर करें॥
(अथवा)
भास्कर मंगलदायक चंद्र,
सुबुद्धिहिं देहु सदा बुध ज्ञाना।
शारद-से गुरु पूजित शुक्र,
सुखी सब राखहु संत सुजाना।
मंदा शनि राहु-केतु समेत
सदा मम पीर हरौ भगवाना।
नौ ग्रह शांत रहैं जग में
नित वंदत हूँ प्रभु नौ ग्रह नामा॥
(अथवा)
भानु कृपालु सदा सुख दें
शशि सुंदर शीतलता सुखकारी।
मंगल देव सदा जयवंत करें
बुध बुद्धि सुबुद्धि के हैं अधिकारी॥
गुरु ज्ञान के पुंज महर्षि सदा
भृगु नंदन शुक्र करें सुख भारी।
शनि राहु और केतु हरे सब पीर
करौं विनती नित नौ ग्रह धारी॥
(अथवा)
श्री रवि राज करें सुख साज़
सदा शशि शीतलता सुख-छाया।
भौम करै बल-बुद्धि सदा
बुध ज्ञान धरै मन में अति भाया॥
देव गुरु गुरुता प्रकटावहिं
शुक्र सुभोग करैं शुभ दाया।
शनि राहु हरैं सब पीर हमारी
केतु सदा जयकार मचाया॥
आदित्याय च चन्द्राय, भौमाय बुधाय च।
गुरु शुक्र शनिभ्यश्च राहवे केतवे नमः॥
॥ पूजनोपरांत श्री नवग्रह प्रार्थना ॥
सूर्य॔म् शौर्य मथेन्दु रुच्च पदवीं,
सन्मङ्गलम मंङ्गलः।
सद्बुद्धिम च बुधो गुरुश्च गुरुतां,
शुक्रः सुखं शं शनिः॥
राहुर्बाहुबलं करोतु सततं,
केतुः कुलस्योउन्नतिम्।
नित्यं प्रीति करा भवन्तु मम ते,
सर्वेऽनुकूला ग्रहाः॥
आयुश्च वित्तञ्च तथा सुखं च, धर्मार्थलाभौ वहुपुत्रतां च।
शत्रुक्षयं राजसु पूज्यतां च, तुष्टा ग्रहाः क्षेमकरा भवन्तुः॥
॥ श्री रुद्र कलश ध्यानं-आवाहनम् ॥
आदौ पञ्चनदं प्रयागमपरं
केदारकुण्डं कुरुः
क्षेत्रं मानसकं सरोऽमृतजलं
शावस्य तीर्थ परम्।
मत्स्यो दर्यथ दण्ड खाण्ड सलिलं
मन्दाकिनी जम्बुकं
घण्टा कर्ण समुद्र कूप सहितो
देयात्सदा मङ्गलम्॥
॥ श्री रुद्रकलश हिन्दी आवाहन ॥
शीश सुशोभित पल्लव सुंदर
कंचन-घट में भरे जल नीरा।
रुद्र स्वरूप सदा शिव साजत
पावन मूरति मंगलधीरा॥
वारिद के पति वरुण पुनीत
विराजत हैं घट में सुखकारी।
कीजै कृपा मम पूरन कारज
वंदत शीश झुका बलिहारी॥
॥ पूजनोपरांत श्री रुद्र कलश प्रार्थना ॥
रेवा कुण्ड जलं सरस्वति जलं
दुर्वा सकुण्डं ततो
लक्ष्मी तीर्थ लवांकुशस्य सलिलं
कन्दर्पकुण्डं तथा।
दुर्गां कुण्डमसी जलं हनुमतः
कुण्डप्रताऽपोर्जितः
प्रज्ञानप्रमुखानि वः प्रतिदिनं
देयात्सदा मङ्गलम्॥
॥ श्री लिङ्गतोभद्रमण्डल ध्यानं-आवाहनम् ॥
हिम धवल मुदारं चन्द्र सूर्याग्नि धारम्
निजजन मविकारं निर्मिमाणं मुदारम्।
गगन वितत देहं सर्वसौख्यैकगेहं
निटिल कृत कलेशं श्री महेशं नमामि॥
(अथवा)
कण्ठे यस्य लसत् कराल-गरलं,
गङ्गाजलं मस्तके।
वामाङ्गे गिरिराज-राज-तनया,
जाया भवानी सती॥
नन्दि-स्कन्द-गणाधिराज-सहितः,
श्रीविश्वनाथप्रभुः।
काशी-मन्दिर-संस्थितोऽखिलगुरुः,
देयात् सदा मङ्गलम्॥
॥ श्रीलिङ्गतोभद्रमण्डल हिन्दी आवाहन ॥
शीश जटा गंग की धार लसै,
गल-मुण्डन की अति माल सुहाई।
लिङ्गतोभद्र-सुमण्डल पे,
धरि ध्यान सदा शिव की छवि ध्याई॥
नाशत विघ्न हरै सब पीर,
महा सुखदायक शम्भु सहाई।
कीजै कृपा मम जीवन में,
प्रभु मोक्ष मिलै पद की रज पाई॥
(अथवा)
सुर-सिद्ध समाहित शम्भु सदा,
शुभ लिङ्गतोभद्र बना मन भायो।
विधि के अनुसार सुचित्र रची,
पुनि अक्षत-पुष्प सुपात्र सजायो।
प्रभु आश्रित दास पुकारत है,
मम पाप हरो भव-ताप नसायो।
करुणा-निधि दीजिये ज्ञान हमें,
शिव मङ्गल-रूप सदा सुखदायो॥
॥ पूजनोपरांत श्रीलिङ्गतोभद्रमण्डल प्रार्थना ॥
हस्ताभ्यां कलशद् वयामृतघटै:
आप्ला वयन्तं शिरः
द्वाभ्यां तौ दधतं मृगाक्ष वलये
द्वाभ्यां वहन्तं परं।
अंके न्यस्त करद् वयामृतघटं
कैलास कान्तं शिवं
स्वच्छांभो जगतं नवेन्दु मुकुटं
देवं त्रिनेत्रं भजे॥
॥ श्री सर्वतोभद्रमण्डल ध्यानं-आवाहनम् ॥
यं ब्रह्मा वरुणेन्द्र रुद्र मरुतः,
स्तुवन्ति दिव्यैः स्तवै।
र्वेंदेःसाङ्ग पद क्रमोप निषदिर्,
गायन्ति यं सामगाः।
ध्याना वस्थित तद् गतेन मनसा,
पश्यन्ति यं योगिनो,
यस्यान्तं न विदुः सुरा सुरगणा,
देवाय तस्मै नमः॥
॥ श्री सर्वतोभद्रमण्डल हिन्दी आवाहन ॥
वेदी प्रधान में देव प्रधान,
कृपा करके अब आन पधारें।
देवन्ह के संग हे सर्वेश
हमे भव सिन्धु से पार उतारें॥
यज्ञ क्रिया को पूर्ण करें
इस सर्व समाज को आप सुधारें।
होय सुखी यजमान सदा
जजमान के जीवन के रखबारें॥
(अथवा)
राजत सुन्दर सर्वतोभद्र
सुदेश यहाँ शुभ मण्डल भारी।
ब्रह्मादिक देव सबै मिलि के
जहँ आवत हैं धरि प्रीति सँवारी॥
वेद-रिचा ध्वनि होत पवित्र
जहँ मंगल मोद भये सुखकारी।
कीजै सदा प्रभु वन्दन हम सब,
पूरन होय सकल मनहारी॥
(अथवा)
सकलान्वय सर्वदिशा शुभदायक
सर्वतोभद्र नमूं नित तोहीं।
हरि-ब्रह्मा-महेश समस्त सुरेश्वर,
वंदत हैं मन में अति मोहीं॥
कीजै कृपा प्रभु विघ्न सभी हर,
सुख शान्ति सर्वत्र भरो जग जोहीं।
प्रणवौं पद-पद्म धरूँ उर में,
नित प्रार्थना है मुद-मङ्गल होहीं॥
॥ पूजनोपरांत श्रीसर्वतोभद्रमण्डल प्रार्थना ॥
योस्योत्प्रेक्षक आदि मध्य निधने
योऽव्यक्त जीवेश्वरो,
उयः सृष्ट वेद मनु प्प्रि वश्य ऋषिणा
चक्रे पुरः शास्ति ताः।
यं संपद्य जहात्यजा मनुशयी
सुप्तः कुलायं यथा,
तं कैवल्य निरस्तयोर् निमभयं,
ध्याये दजस्त्रं हरिम्॥
॥ श्रीगौरीतिलक मण्डल ध्यानं-आवाहनम् ॥
सुधा सिन्धो मध्ये, सुर विटप वाटी परिवृते
मणि द्वीपो नीपो, पवनति चिन्तामणि गृहे।
शिवांकारे मञ्चे, परं शिव पर्यंक निलये
भजन्तिं त्वां धन्यां, कतिचन चिदानन्द लहरी॥
॥ श्री गौरीतिलकमण्डल हिन्दी आवाहन ॥
गौर-शरीर सुशोभित भाल पै
दिव्य तिलक छबि सोहत नीकी।
चंदन की छवि वेद रची प्रति
मंगल-मूर्ति बनी जन जी की॥
गौरी भवानी सदा सुखदायिनी
नित्य नमें अरु पूजहिं तीकी।
माँगि यही वरदान तुम्हीं सों
दया करो अम्ब भजैं सब नीकी॥
(अथवा)
भाल सजी तिलकेश्वर वेदी
गौरी के नित शीश सुहाई।
लाल ललाट बिराजत ज्योति
मंगल रूपहि ध्यान लगाई॥
भक्तन के मन वांछित पूरण
संकट मोचन शक्ति दिखाई।
मातु भवानी कृपा करि दैयहु
संभु सुता जय सर्व सदाई॥
(अथवा)
शीश धरी शशि की कलिका
गल माल विराजति सर्प सुहाई।
गौरीतिलकवेदी सोहै जहाँ,
छबि देवसहायक मङ्गल दाई।
भोर भये नित ध्यावत हैं
सुर-किन्नर नाग मुनीश दुहाई।
दीन दयाल कृपा करि के
मम संकट काटहु शम्भु सहाई॥
॥ पूजनोपरांत श्रीगौरीतिलकमण्डल प्रार्थना ॥
किं कार्यं कठिनं कुतः परिभवः
कुत्राप वादाद् भयं
किं मित्रं न हि किन्नु राजसदनं
गम्यं न विद्या च का।
किं वाऽ न्यज्-जगती तले प्रवदयत्
तेषाम् सम्भावितं
येषां हृत्कमले सदा वसति सा
तोषप्रदा सङ्कटा॥
॥ श्री दुर्गा ध्यानं-आवाहनम् ॥
अम्बा शाम्भवि चन्द्रमौलिरमणा
वरदा उमा भारती
काली हेमवती शिवा त्रिनयनी
कात्यायनी भैरवी।
सावित्री नवयौवना शुभकरी
साम्राज्यलक्ष्मीप्रदा
चिद्रूपी परदेवता भगवती
श्रीराजराजेश्वरी श्रीराजराजेश्वरी॥
(अथवा)
सिंहा दुत्थाय कोपात्, धधड़ घड़ घड़द्,
धाव माना भवानी।
शत्रूणां शस्त्रपाते, ततड़ तड़ तड़द्
त्रोटयन्तीं शिरांसि॥
तेषां रक्तं पिबन्तीं, घुघुट घुट घुटद्
घोटयन्ती पिशाचीम्।
तृप्तां तृप्तां तर्पयन्तीं, खखद खद खदद्
भैरवी नः पुनातु॥
॥ श्री दुर्गा जी हिन्दी ध्यान ॥
हे महारानी महा वरदानी
महा सुखकारी महेश प्यारी।
हे महिमामयि मैहर वासिनि
मानव दानव देव सुखारी॥
हे महिषासुर मर्दिनी माता
मनोहर मोहक छवि है तुम्हारी।
देश अनाथ हुआ महारानी
बची अब केवल आस तुम्हारी॥
(अथवा)
पाप बढ़े चहुँ ओर भयानक
हाथ कृपाण त्रिशूलहु धारो।
रक्त पिपासु लगे बढ़ने
दुख के महिषासुर को अब टारो॥
ताण्डव से अरि रुण्डन मुण्डन
को बरसा कर के रिपु मारो।
नाहर पे चढ़ भेष कराल
बना कर ताप सभी तुम हारो॥
॥ पूजनोपरांत श्री दुर्गा प्रार्थना ॥
या देवी महिषासुरप्रमथनी
या चण्डमुण्डापहा
या शुम्भासुर रक्तबीज दमनी
शक्रादिभिः संस्तुता।
या शूलासिधनुःशराभयकरा
दुर्गादिसन्दक्षिणा।
माश्रित्याश्रित विघ्नशंस मयतु
देयात्सदा मङ्गलम्॥
(अथवा)
आद्या श्रीर्विकटा ततस्तु विरजा
श्रीमङ्गला पार्वती
विख्याता कमला विशालनयना
ज्येष्ठा विशिष्टानना।
कामाक्षी च हरिप्रिया भगवती
श्रीघण्ट घण्टादिका
मौर्या षष्टि सहस्र मातृ सहिता
देयात्सदा मङ्गलम्॥
॥ श्री त्रिशक्ति ध्यानं-आवाहनम् ॥
महाकालीरूपा, त्वमसि दनुजानां क्षयकरी।
महालक्ष्मीरूपा, त्वमसि भजतां भोगकरणी॥
महावाणीरूपा, त्वमसि जगतां मोहहरणी
स्मरामि त्वाम् नित्यं, सकल जगतामेक जननीम्॥
॥ श्री त्रिशक्ति हिन्दी ध्यान ॥
आवत हैं त्रिशक्ति यहाँ,
मन मंदिर में छवि आज धरी।
काली कृपालु, दयालनि लक्ष्मी,
शारद ज्ञान की ज्योति भरी॥
शीश नवावत ध्यान धरैं नित,
विघ्न हरैं सब पीर हरी।
मैया! पुकार सुनों अब आप
हमारी विपत्ति दूर करो॥
(अथवा)
या सुमिरैं नर आदर सों,
अरु ध्यान धरैं मन में नित ध्यानैं।
कोटि कला करिकै जुग में,
सब सिद्धि-सुधा रस को सरसावैं॥
कालिहि, लक्ष्मिहि, शारद को,
‘त्रिशक्ति’ सदा हम शीश नवावैं।
आइकै ध्यान हमारे हिये,
भव-ताप हरैं सब कष्ट नसावैं॥
॥ श्री महाकाली ध्यानं-आवाहनम् ॥
या कालिका रोगहरा सुवन्द्या
र्वैश्यैः समस्तैर्व्यवहारदक्षैः।
जनैर्जनानां भयहारिणी च
सा देवमाता मयि सौख्यदात्री॥
(अथवा)
या माया प्रकृतिः शक्तिश्चण्डमुण्ड विर्मदनी।
सा पूज्या सर्वदेवैश्च ह्यस्माकं वरदाभव॥
(अथवा)
विश्वेश्वरि त्वं परिपाल्य विश्वं
विश्वात्मिका धारयतीति विश्वभु।
विश्वेशवन्द्याभवती भवन्ति
विश्वाश्रया ये त्वयिभक्तिनम्राः॥
(अथवा)
शवारूढां महाभीमां, घोरदंष्ट्रां वरप्रदां
हास्ययुक्तां त्रिणेत्राञ्च, कपाल कर्त्रिका करां।
मुक्तकेशीं ललज्जिह्वां, पिबन्तीं रुधिरं मुहुः
चतुर्बाहुयुतां देवीं, वराभयकरां स्मरेत्॥
॥ श्री महाकाली हिन्दी ध्यान ॥
जो कोऊ टेरतु तोहि गरीब
रहें धनदा बनि बाकैं भवानी।
दुर्गति दूरि करै पलमें निज
सेवक की काली महारानी॥
बंदत ही पद पद्म के देति
महा मतिमंदिनि मातु शिवानी।
होउ कृपालु हरौ कलि क्लेसनि
काली कराली बनी बरदा॥
(अथवा)
आनन भीषण भैरव-भेष
कराल त्रिशूल सुशोभित हाथ में।
सिंह चढ़ी कर में करवाल
दहाड़ति आवति लाँगुरा साथ में॥
काटति मुण्ड झपट्टि अरीन के
पीवति रक्त लगावति गात में।
भक्तनि को, फल चारहु देति
शिवा जगदम्बिका बात की बात में॥
॥ पूजनोपरांत श्री महाकाली प्रार्थना ॥
दधानां मुण्डानाम अतिरूचिरमालं निजगले।
पिबन्तीं दैत्यानां खलु समरमध्ये च रुधिरम्॥
कारालास्यां देवीं विततरसना दुष्टशमनीं।
महाकालीं वन्दे दनुज दलहन्त्री भगवतीम्॥
नग्नां श्मशानवासिनीं रक्तनेत्रां भयानकाम्।
मुण्डमालाविभूषां तां कालीं वन्दे शिवप्रियां॥
दिगम्बरा श्मशानस्था भूतप्रेतसमन्विता।
करालवदना घोरा काली कपालमालिनी॥
॥ श्री महालक्ष्मी ध्यानं-आवाहनम् ॥
या रक्ताम्बुज वासिनी विलासिनी
चण्डांशु तेजस्विनी।
या रक्ता रुधिराम्बरा हरिसखी
या श्री मनोल्हादिनी॥
या रत्नाकर मन्थनात्प्रगटिता
विष्णो स्वया गेहिनी।
सा मां पातु मनोरमा भगवती
लक्ष्मीश्च पद्मावती॥
॥ श्री महालक्ष्मी हिन्दी ध्यान ॥
हे अपराजित! अच्युत हे!
अचला अनया अजया अघहारी।
श्रीहरि विष्णु महेंद्र मनोहर
पुण्य प्रजापति हे त्रिपुरारी॥
हे दुखनाशक हे सुखदायक
मां लक्ष्मी! आप ही हैं अवतारी।
दीनदयाल दया करिये
जय हे जय हे भवसागर तारी॥
॥ पूजनोपरांत श्री महालक्ष्मी प्रार्थना ॥
वन्दे लक्ष्मीं परशिवमयीं
शुद्धजाम्बूनदाभां
तेजोरूपां कनकवसनां
सर्वभूषोज्ज्ववलाङ्गीम्।
बीजापूरं कनककलशं
हेमपद्मं दधानाम्।
आद्यां शक्तिं सकलजननी
विष्णुवामाङ्कसंस्थाम्॥
॥ श्री महासरस्वती ध्यानं-आवाहनम् ॥
या कुन्देन्दु तुषारहार धवला
या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा
या श्वेतपद्मासना॥
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभि-
र्देवैः सदा वन्दिता।
सा मां पातु सरस्वती भगवती॥
निःशेषजाड्यापहा
शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमं
आद्यां जगद्व्यापनीं।
वीणा-पुस्तक-धारिणीं अभयदां
जाड्यांधकारपहाम्॥
हस्ते स्फाटिक मालिकां विदधतीं
पद्मासने संस्थिताम्।
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं
बुद्धिप्रदां शारदाम्॥
चतुर्भुजां चन्द्रवर्णां चतुरानन वल्लभाम्।
आवाहयामि वाग्देवि वीणा पुस्तक धारिणीम्॥
॥ श्री महासरस्वती हिन्दी ध्यान ॥
वन्दन करूँ शारदा सरस्वती।
मात पिता तू अखिल जगत की॥
आदि माय तू आदि भवानी।
तूं प्रतिपालक हम पर जननी॥
जनम देत तू रक्षक मानी।
पूर्ण कृपा कर हम पर जननी॥
अब हम बालक शरण तिहारी।
दया दृष्टि हो जननी तूम्हारी॥
शरणागत की लाज बखानी।
तूं प्रतिपालक सब जग जननी॥
॥ पूजनोपरांत श्री महासरस्वती प्रार्थना ॥
शशि शुद्ध सुधा हिमधामयुगम्,
शरदाम्बर बिम्ब समानकरम्।
बहुरत्न मनोहर कान्तियुतम्,
तव नौमि सरस्वति पादयुगम्॥
सरस्वती नमस्तुभ्यं वरदे काम रूपिणी।
विद्यारम्भम् करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा॥
सरस्वती महादेवी, हंसवाहिनी दायिनी।
वीणा पुस्तक संयुक्ता, विद्या दानं देहु मम॥
यथाऽग्नेर्दाहिकाशक्ती रामकृष्णे स्थिता हि या।
सर्वविद्यास्वरूपां तां सारदां प्रणमाम्यहम्॥
॥ श्री मृत्युन्जयमहादेव ध्यानं-आवाहनम् ॥
हस्ताम्भोज-युगस्थ-कुम्भयुगला,
दुद्धृत्य तोयं शिरः।
सिञ्चन्तं करयोर् युगेन दधतं
स्वाङ्के सकुम्भौ करौ॥
अक्षस्रग्-मृगहस्त मम्बु जगतं
मूर्द्धस्थ चन्द्रं स्रवत्।
पीयूषोऽत्र तनुं भजे स-गिरिजं,
मृत्युञ्जयं त्र्यम्बकम्॥
॥ श्री मृत्युन्जयमहादेव हिन्दी ध्यान ॥
शीश जटा सिर सोहत है
अरु भाल विशाल लिलार सजे।
गल मुण्डन अक्ष की माला सुशोभित
त्रिलोचन शोभित ध्यान भजे॥
कर में घट घट लिए अमृत के
प्रभु रुद्र भये हरते भव-भय
तुम ही दुख-हारी सदाशिव हो
मम पाप हरो हे मृत्युंजय॥
॥ पूजनोपरांत श्री मृत्युन्जयमहादेव प्रार्थना ॥
आयुर्नश्यति पश्यतां प्रतिदिनं
याति क्षयं यौवनं
प्रत्या यान्ति गताः पुनर्न दिवसाः
कालो जगद् भक्षकः।
लक्ष्मीस्तोय तरङ्ग भङ्ग चपला
विद्युच्चलं जीवितं
तस्मान्मां शरणागतं शरणदः
त्वं रक्ष रक्षाधुना॥
॥ श्रीशिव ध्यानं-आवाहनम् प्रार्थना ॥
ॐ महोक्षः खट्वाङ्गं
परशु रजिनम् भस्म फणिनः।
कपालं चेतीयत्
तव वरद तन्त्रोपकरणम्॥
सुरास्तां तामृद्धि
दधति तु भवद् भू प्रणिहितां।
न हि स्वात्मारामं
विषय मृगतृष्णा भ्रमयति॥
(अथवा)
कण्ठे यस्य लसत्कराल-गरलं
गङ्गाजलं मस्तके।
वामाङ्गे गिरिराजराज-तनया
जाया भवानी सती॥
नन्दि-स्कन्द-गणाधिराज-सहितः
श्रीविश्वनाथप्रभुः।
काशी-मन्दिर-संस्थितोऽखिलगुरुः
देयात् सदा मङ्गलम्॥
(अथवा)
गङ्गा तरङ्ग रमणीय जटा कलापं,
गौरी निरंतर विभूषित वाम भागम्।
नारायण प्रियमनङ्ग मदापहारं,
वाराणसी पुरपतिं भज् विश्वनाथम्॥
(अथवा)
गिरीशं गणेशं गले नील वर्णं
गजेन्द्राधिरूढं गुणातीत रूपम।
भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं
भवानी कलत्रं भजे पंञ्चवक्त्रम्॥
(अथवा)
ॐ वन्दे देव उमापतिं सुरगुरुं,
वन्दे जगत्कारणम्।
वन्दे पन्नगभूषणं मृगधरं,
वन्दे पशूनां पतिम्॥
वन्दे सूर्य शशांक वह्नि नयनं,
वन्दे मुकुन्दप्रियम्।
वन्दे भक्त जनाश्रयं च वरदं,
वन्दे शिवंशंकरम्॥
॥ श्री शिव हिन्दी ध्यान ॥
शीश पे गंग हे कण्ठ भुजङ्ग
हे कोटि अनंग लजावन वाले।
हाथ त्रिशूल हे नाशक शूल
वही डमरू के बजावन वाले॥
मृगछाल सुशोभित है कटि पे
और भक्त की लाज बचावन वाले।
शंकर की महिमा है अपार
ये दानी बड़े हे बड़े भोले भाले॥
॥ श्रीविष्णु ध्यानं-आवाहनम् प्रार्थना ॥
सशंख-चक्रं सकिरीट-कुण्डलं
सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम्।
सहार-वक्षस्थल-शोभि-कौस्तुभं
नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम्॥
(अथवा)
क्षीरोदन्वत्प्रदेशे शुचि मणि विलसत्
सैकते मौक्तिकानां।
मालाक्लृप्तासनस्थः स्फटिक मणिनिभै
मौक्तिकैर्मण्डितांगः॥
शुभ्रै रभ्रै रदभ्रै रुपरिविरचितै-
र्मुक्त पीयूष वर्षेः।
आनन्दी नः पुनीया दरि नलिन गदा
शंखपाणि-र्मुकुन्दः॥
(अथवा)
भूःपादौ यस्य नाभिर्वियदसुरनिल-
श्चन्द्रसूर्यौ च नेत्रे।
कर्णावाशाः शिरो द्यौर्मुखमपि दहनो
यस्य वास्तेयमब्धिः॥
अन्तस्थं यस्य विश्वं सुर-नर-खग-गो
भोगि-गन्धर्व दैत्यैः।
चित्रं रंरम्यते तं त्रिभुवन-वपुषं
विष्णुमीशं नमामि॥
(अथवा)
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभांगम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिहृद्ध्यान-गम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
(अथवा)
मेघश्यामं पीतकौशेयवासं
श्रीवत्साङ्क कौस्तुभोद् भासिताङ्गम्।
पुण्योपेतं पुण्डरीकायताक्षं विष्णुं
वन्दे सर्वलोकैक-नाथम्॥
(अथवा)
नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्त्र मूर्तये,
सहस्त्रपादाक्षि शिरोरु बाहवे।
सहस्त्र नाम्ने पुरुषाय शाश्वते,
सहस्त्रकोटि युग धारिणे नमः॥
(अथवा)
हे रामः पुरुषोत्तमं नरहरिं
नारायणं केशवं।
गोविन्दं गरुड़ध्वजं गुणनिधिं
दामोदरं माधवं॥
हे कृष्णः कमलापतिं यदुपति
सीतापतिं श्रीपतिं।
बैकुण्ठाधिपतिं चराचरपतिं
लक्ष्मींपतिं पाहिमाम्॥
नमः समस्त-भूतानामादिभूताय भूभृते।
अनेकरूप-रूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे॥
छायायां पारिजातस्य हेमसिह्मासनोपरि।
आसीन मंबुद श्याम मायताक्ष मलंकृतम्॥
चन्द्राननं चतुर्बाहुं श्रीवत्साङ्कित-वक्षसम्।
रुक्मिणी-सत्यभामाभ्यां सहितं कृष्णमाश्रये॥
शुद्धस्फटिकसंकाशं चन्द्रकोटिसमप्रभम्।
एवं ध्यायेन्महाविष्णुमेवं वा विनयान्वितः॥
॥ श्रीविष्णु हिन्दी ध्यान ॥
हाथ में चक्र रहे जिनके
अरु शेष की शय्या विराज रहे हैं।
भक्त का मान सदा रखते
निज भक्त का भाव निहार रहे है॥
ध्यान करें जो सदा इनका
उसकी मनसा को सवाँर रहे हैं।
हे शालिग्राम ! हे विष्णु चतुर्भुज !
आपको भक्त पुकार रहे है॥
॥ श्री कृष्ण ध्यानं-आवाहनम् प्रार्थना ॥
कस्तूरीतिलकं ललाटपटले
वक्ष:स्थले कौस्तुभं
नासाग्रे वरमौत्तिकं करतले
वेणुं करे कंकणम।
सर्वाङ्गे हरिचन्दनं सुललितं
कण्ठे च मुक्तावलि –
र्गोपस्रीपरिवेष्टितो विजयते
गोपाल चूडामणिः॥
फुल्लेन्दी वर कान्ति मिन्दु वदनं
बर्हावतंसप्रियं
श्रीवत्साड़्क मुदार कौस्तुभ धरं
पीताम्बरं सुन्दरम।
गोपीनां नयनोत्पलार्चित तनुं
गोगोपसंघावृतं
गोविन्दं कलवेणुवादन परं
दिव्याङ्गभूषं भजे॥
(अथवा)
बर्हापीडं नटवरवपुः,
कर्णयोः कर्णिकारं
बिभ्रद् वासः कनक कपिशं
वैजयन्तीं च मालाम्॥
रन्ध्रान् वेणुर्धर सुधया,
पूरयन गोपवृन्दैः-
वृन्दारण्यं स्वपदरमणं
प्राविशद् गीतकीर्तिः॥
॥ श्री कृष्ण हिन्दी ध्यान ॥
सुंदर स्याम मनोहर मूर्ति
श्री ब्रजराज कुँवर बिहारी।
मोर पंखा सिर गुंज हरा
बनमाल गले कर बंसिकाधारी॥
भूषण अंग के संग सुसोभित
लोभित होत लखें ब्रजनारी।
राधिका वल्लभ की दृग गेह
बसो नव गेह रहों पतिवारी॥
॥ श्री राधा ध्यानं-आवाहनम् प्रार्थना ॥
हेमाभां द्विभुजं वराभयकरां
नीलाम्बरेणादृतां
श्यामक्रोड विलासिनीं भगवतीं
सिन्दूर पुज्जोज्ज्वलाम्।
लोलाक्षीं नवयौवनां स्मितमुखीं
बिम्बा धरां राधिकां
नित्या नन्दमयीं विलास निलयां
दिव्यांग भूषां भजे॥
राधा रासेश्वरी रम्या कृष्णमन्त्राधिदेवता।
सर्वाद्या सर्ववन्द्या च वृन्दावनविहारिणी॥
वृन्दारध्या रमा शेषगोपीमण्डलपूजिता।
सत्या सत्यपरा सत्यभामा श्रीकृष्णवल्लभा॥
वृषभानुसुता गोपी मूलप्रकृतिरीश्वरी।
गान्धर्वा राधिका रुक्मिणी परमेश्वरी॥
परात्परतरा पूर्णा पूर्णचन्द्रविमानना।
भुक्ति-मुक्तिप्रदा भवव्याधिविनाशिनी॥
॥ श्री राधा हिन्दी ध्यान ॥
श्री राधे वुषभानुजा, भक्तनि प्राणाधार।
वृन्दाविपिन विहारिणी, प्रानावौ बारम्बार॥
जैसो तैसो रावरौ, कृष्ण प्रिया सुखधाम।
चरण शरण निज दीजिये, सुन्दर सुखद ललाम॥
श्री राधा सर्वेश्वरी, रसिकेश्वर धनश्याम।
करहुँ निरंतर बास मैं, श्री वृन्दावन धाम॥
तप्त कांचन गोरांगी राधे वृन्दा वनेश्वरि।
वृषभानु सुते देवि, प्रणमामि हरिप्रिये॥
॥ श्री राम ध्यानं-आवाहनम् प्रार्थना ॥
नीलेन्दी वर तुल्य श्याम वदनं
पीताम्बरालङ्कृतम्
मुद्रां ज्ञानमयीं दधा नम परां
पद्मासने संस्थिताम्।
सीतां पार्श्वगतां सरोरुहकरां
विद्युन्निभां राघवम्
पश्यन्तीं मुकुटां गदादि विविधैः
कल्पोज्वलाङ्गं भजे॥
॥ श्री राम हिन्दी ध्यान ॥
राम के नाम सा नाम नहीं
जग संत कहें श्रुति चारि बखानी।
राम कथानक राम स्वयं
बिन राम नहीं कहीं राम कहानी॥
राम बिना नहिं राम कहीं
बस रामहि राम रमे रजधानी।
राम के काम की, काम ही राम के,
राम के नाम की, राम निशानी॥
॥ श्री हनुमान ध्यानं-आवाहनम् प्रार्थना ॥
वंदे वातसुतं सुबोध निलयं,
वन्दे गदा धारिणम्।
वंदे रामकथा सुधा सुरसिकं,
वन्दे कपिन्द्रं सदा॥
सीताराम पदारविन्द युगल,
ध्यानस्थितं सर्वदा।
वंदे संकटमोचनं खलु नृणां,
श्रीराम भक्तं सदा॥
सर्वारिष्टनिवारकं शुभकरं,
पिङ्गाक्षमक्षापहं
सीतान्वेषणतत्परं कपिवरं,
कोटीन्दुसूर्यप्रभम्।
लङ्काद्वीपभयङ्करं सकलदं,
सुग्रीवसम्मानितं
देवेन्द्रादि समक्तदेवविनुतं,
काकुत्थदूतं भजे॥
(अथवा)
श्रीरघुराजपदाब्ज निकेतन
पङ्कजलोचन मंगलराशे,
चण्ड महाभुजदण्ड सुरारि
विखण्डन पण्डित पाहि दयालो।
पातकिनं च समुद्धर मां
महता हि सतामपि मानमुदारं,
त्वां भजतो मम देहि दयाघन!
हे हनुमत्! स्वपदाम्बुजदास्यम्॥
(अथवा)
ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय परयन्त्र तन्त्र त्राटक नाशकाय सर्वज्वरच्छेदकाय सर्वव्याधिनिकृन्तकाय सर्वभय प्रशमनाय सर्वदुष्ट मुखस्तंभनाय सर्वकार्य सिद्धिप्रदाय रामदूताय स्वाहा॥
॥ श्री हनुमान हिन्दी ध्यान ॥
आरत बन पुकारत हौं
कपिनाथ सुनो विनती मम भारी।
अंगद औ नल-नील महाबलि
देव सदा बल की बलिहारी॥
जाम्बवन्त् सुग्रीव पवन-सुत
दिबिद मयंद महा भटभारी।
दुःख दोष हरो दुःखिया जन-को
श्री द्वादश बीरन की बलिहारी॥
॥ श्री महाकाल ध्यानं-आवाहनम् प्रार्थना ॥
महाकाल, महादेव! दुष्ट दंड कर प्रभो
मुक्ति प्रयच्छ नः शम्भो संसाराम्बुधितः शिव।
अत्रैव् लोक रक्षार्थं स्थातव्यं हि त्वया शिव
स्वदर्श कान् नरांछम्भो तारय त्वं सदा प्रभो॥
आशुः शिशानं वृषभं रोरुवाणं कृतं धर्मं वितथं चाशुशेषम।
वसुन्धरं समृजिकं समं त्वां धृतव्रत शूलधरं प्रपद्ये॥
॥ श्री महाकाल हिन्दी ध्यान ॥
भाल विशाल विराजित चन्द,
ललाट पे सोहत भस्म अपारा।
शीश जटा गंग की धार बहे,
गल मुण्ड की माल करै उजियारा॥
डमरू कर बाजत नाद महा,
त्रिशूल धरें शिव रूप करारा।
आओ त्रिलोचन कालहरो,
मम ध्यान धरो शिव शंकर प्यारा॥
॥ श्री तुलसी माता ध्यानं-आवाहनम् प्रार्थना ॥
तुलसी श्रीर्महालक्ष्मीर्विद्याविद्या यशस्विनी।
धर्म्या धर्मानना देवी देवीदेवमन: प्रिया॥
लभते सुतरां भक्तिमन्ते विष्णुपदं लभेत्।
तुलसी भूर्महालक्ष्मी: पद्मिनी श्रीर्हरप्रिया॥
मातस्तुलसि गोविन्द हृदयानन्द कारिणी।
नारायणस्य पूजार्थं चिनोमि त्वां नमोस्तुते॥
वृंदा वृंदावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी।
पुष्पसारा नंदनीय तुलसी कृष्ण जीवनी॥
॥ तुलसी माता हिन्दी ध्यान ॥
हरि की प्रिय हो तुम त्रिभुवन वंदित,
पतितन तारिनि, हे तुलसी।
श्यामा सुकुमारी, हरि प्रिय प्यारी,
मंगलकारी, सुखकरनी॥
तुलसी दल पावन, रोग नशावन,
हरै विपदा दुःखिया जन की।
संकटनाशनि, पातकनाशिनि,
पुन्यातु पुनीत कहै सब की॥
॥ श्री शीतला माता ध्यानं-आवाहनम् प्रार्थना ॥
शीतले त्वं जगन्माता शीतले त्वं जगत्पिता।
शीतले त्वं जगद्धात्री शीतलायै नमो नमः॥
॥ श्री शीतला माता हिन्दी ध्यान ॥
या छवि सौम्य ललाम विराजति,
सीतल मन्द सुगंध बयारी।
हाथ लिए कर सूप सुमार्जन,
कुम्भ लिए जल की कलशारी॥
ध्यान धरें मन में नित जो नर,
संकट दूर करैं दुखहारी।
आवत हैं हम ध्यान धरैं प्रभु,
शीतलता भरि देउ हमारी॥
॥ श्री गङ्गा माता ध्यानं-आवाहनम् प्रार्थना ॥
श्वेतचम्पकवर्णाभां गङ्गां पापप्रणाशिनीम्।
कृष्णविग्रहसम्भूतां कृष्णतुल्यां परां सतीम्॥
ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां शश्वत्सुस्थिरयौवनाम्।
नारायणप्रियां शान्तां सत्सौभाग्यसमन्विताम्॥
ददर्श पुरतो गंगां द्विभुजां मकरासनाम्।
कुन्देन्दु शंख धवलां सर्वाभरण भूषिताम्॥
॥ श्री गङ्गा माता हिन्दी ध्यान ॥
पल्लव से पद-धूलि लगी,
जन-पाप हरे अरु ताप बुझावै।
ध्यान धरै मुनि संत सदा,
जिनके मन में हरि-भक्ति समावै॥
मोक्षदायिनि जाह्नवि तू,
भव-सागर से जन को तरि जावै।
‘गंग’ तरंगमयी शुचि पावन,
ध्यान धरै भव-पार लगावै॥
॥ सुदर्शन ध्यानं-आवाहनम् प्रार्थना ॥
नमः सुदर्शनायैव सहस्रादित्यवर्चसे।
ज्वालामाला प्रदीप्ताय सहस्राराय चक्षुषे॥
सर्वदुष्ट विनाशाय सर्वपातकमर्दिने।
सुचक्राय विचक्राय सर्वमन्त्र विभेदिने॥
प्रसवित्रे जगद्धात्रे जगद्विध्वंसिने नमः।
पालनार्थाय लोकानां दुष्टासुर विनाशिने॥
उग्राय चैव सौम्याय चण्डाय च नमो नमः।
नमश्चक्षुः स्वरुपाय संसार भय भेदिने॥
माया पञ्जरभेत्रे च शिवाय च नमोनमः।
ग्रहाति ग्रह रूपाय ग्रहाणां पतये नमः॥
ॐ ह्रीं कार्तविर्यार्जुनो नाम राजा बाहु सहस्त्रवान।
यस्य स्मरेण मात्रेण ह्रतं नष्टं च लभ्यते॥
॥ पितृ देव ध्यानं-आवाहनम् प्रार्थना ॥
ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।
नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः॥
ॐ आद्य-भूताय विद्महे, सर्व-सेव्याय धीमहि
शिव-शक्ति-स्वरूपेण, पितृ-देव प्रचोदयात्॥
ॐ पितृगणाय विद्महे, जगत धारिणी धीमहि
तन्नो पितृः प्रचोदयात्॥
शीश नवावत पितृ चरन,
हम ध्यान धरें नित ज्ञान लहैं।
सुख-सम्पति देह सुधारस सों,
दुख-दारिद्रय नाशन तेज बहैं॥
पित्रु-ऋण उतारें सुमिरन सों,
पितृपक्ष में तर्पण अर्घ्य दहैं।
भव-पार उतारहु पितृ-देव,
हम नित्य तुम्हारो ही ध्यान गहैं॥
॥ श्री राम कृष्ण ध्यानं-आवाहनम् प्रार्थना ॥
ॐ स्थापकाय च धर्मस्य सर्वधर्मस्वरूपिणे।
अवतारवरिष्ठाय रामकृष्णाय ते नमः॥
॥ नागभगिनी मनसादेवी ध्यानं-आवाहनम् ॥
श्वेतचम्पकवर्णाभां रत्नभूषणभूषिताम्।
वह्निशुद्धांशुकाधानां नागयज्ञोपवीतिनीम्॥
महाज्ञानयुतां चैव प्रवरां ज्ञानिनां सताम्।
सिद्धाधिष्टातृदेवीं च सिद्धां सिद्धिप्रदां भजे॥
शीश मुकुट, गल नागिन की माला,
तन दिव्य सुवर्ण सुहावन है।
विषकंठ हरी, भयहारी सदा,
मनसा शिव-पुत्रि को ध्यावत है॥
करुणाकरि के वरदान दये,
भक्तन हित संकट नाशन है।
जय नाग भगिनी मनसा शुभदा,
करते मम वंदना-आवाहन है॥
पार्थिव शिव पूजन में गणपति ध्यानं-आवाहनम्
ॐ दधानं भृंगाली मनिश ममले गंड़ युगले।
ददानं सर्वार्थान निज चरण सेवा सुकृतिने॥
दयाधारं सारं निखिल निगमाना मनुदिनम्।
गजास्यं स्मेरास्यं तमिह कलये चित्त निलये॥
गौरव-वर्ण सुशोभित भाल,
विशाल गजानन को छवि भारी।
सूंड सजी गज की मुकुटा सिर,
मस्तक सोहत चन्द उजारी॥
सिद्धिविनायक विघ्नहरन्ता,
आवन कीजिय देव हमारी।
पार्थिव-पूजा में पूज्य प्रथम,
करिहौं शुभ-कामना पूर्ण हमारी॥
पार्थिव शिव पूजन में माता पार्वती ध्यानं-आवाहनम्
ॐ मुखे ते ताम्बूलं नयनयुगले कज्जलकला।
ललाटे काश्मीरं विलसति गले मौक्तिकलता॥
स्फुरत्काञ्ची शाटी पृथु कटि तटे हाटकमयी।
भजामि त्वां गौरीं नगपति किशोरीम् विरतम्॥
गौर-शरीर सुशोभित है,
सिर भाल सुहाग की बिंदी सजै।
कुंडल काननि में छवि दे,
गल माल लसै करुणा-भरी है॥
कौशिकी रूप धरै वरदायिनि,
शैल-सुता शिव संग विराजै।
पार्वती मातु करौ मम वंदन,
भक्तन की यह आस सजी है॥
गौरि सुहाग की मूरत साजि,
सप्रेम लिये मन में अवगाहूँ।
कानन कुंडल सोहत सुंदर,
मस्तक भाल सुभाय सँवारूँ॥
कैलास की स्वामिनी मातु भवानी,
सदा शिव संग विराजति चाहूँ।
आइकै ध्यान करौं मन वांछित,
पार्थिव पूजन मातु बुलाऊँ॥
पार्थिव शिव पूजन में श्री नंदीश्वर ध्यानं-आवाहनम्
ॐ सदानन्दी नन्दी जगत पति धारी सुरपतिः।
महा धर्मो रूप: जन मन विहारी पशुपति:॥
सदा श्रद्धा भक्तिः भवयुत भवानी पाहि माम्।
मखे स्मिन् सांगत्वं महत्पुण्यं दीयताम्॥
गौर वरन सुठि सोहत सुंदर,
सींगनि सों छवि राजति भाल।
घंट बजै गल रुण्डनि की छबि,
देव मुनीश्वर देखि निहाल॥
हे नंदीश! त्रिलोचन के प्रिय,
शंभु समीप विराजहु आप।
ध्यान धरौं प्रभु को मन में मम,
नासहु नंदी! सकल भव-ताप॥
वृषभध्वज के प्रिय वाहन को,
सिर नाइल भाव सुनावत हैं।
नित नन्दिकेश्वर से गण को,
कर जोड़ि के ध्यान लगावत हैं॥
जिनकी ध्वनि सों शिव के मन को,
दुख पीर हरे सुख पावत हैं।
तिन नंदी सुजान को आज इहाँ,
मम पार्थिव पूजन आवत हैं॥
पार्थिव शिव पूजन में श्री वीरभद्र ध्यानं-आवाहनम्
ॐ महावीरो भद्राः क्रतुफल प्रदाता वै पुराः।
कृतः यज्ञः ध्वंसः कृतुपति सदेवा अधिगणा:॥
महकोपा ज्जातः शिवगण प्रधानो बलनिधिः।
मखं रक्षो देव सकल समुदाये कुरु कृपा॥
बाल दिवाकर कोटि समान,
ललाट विशाल त्रिलोचन भ्राजे।
व्याल गले मुकुटा सिर सोहत,
कुण्डल की छवि कुण्डलि साजे॥
शूल कुठार कृपान धरे कर,
वीरभद्र महाबल गाजे।
पार्थिव पूजन में मम हेत,
कृपा करि के प्रभु आवहु आजै॥
शीश जटा, गल मुण्ड की माल,
ललाट विशाल, त्रिनेत्र सुहावै।
कंकन सर्प, त्रिशूल विशाल,
कराल कराल, कलिंद घटावै।
दक्ष-मुख-ध्वंसन, रुद्र-प्रसूति,
भयंकर मूर्ति, जगत डरावै।
वीर-भद्र! मम पार्थिव पूजन,
हे प्रभु! पावन, तुव गुन गावै॥
पार्थिव शिव पूजन में श्री कार्तिकेय ध्यानं-आवाहनम्
ॐ शिखीवाहोदेवः समरभयकारी शिव सुतः।
परम सेनानी त्वं षड्मुख तथा द्वादश भुजः॥
महाशक्ति शोभा अमरगण सेवित सर्वदा।
व्रजामः त्वां शरणं प्रणत भयहारी ते यशः॥
सोहत सुंदर भाल लिलार सु,
कुंडल कुंचित केस सँवारे।
सोहै शरीर पै चारु पीतंबर,
मोर मुकुट छवि लागत प्यारे॥
स्कंद कुमार कृपालु महाप्रभु,
शक्ति त्रिशूल करैं कर धारे।
कार्तिक स्वामी सु आजु पधारहु,
पार्थिव पूजन हेत हमारे॥
भाल विराजत सुन्दर कोमल,
कुण्डल की छवि होत अनूपा।
मोर के पंख सुशोभित शीर्ष पे,
रूप दयामय सुन्दर सूपा॥
देव-अनीक के सेनानायक,
तारक-दैत्य-विदारक भूपा।
आओ हमारे इस पार्थिव पूजन,
शक्ति-प्रचण्ड सुशोभित रूपा॥
पार्थिव शिव पूजन में श्री कुबेर ध्यानं-आवाहनम्
ॐ धनेशो यक्षेशो गिरीश प्रियदेवो निधिपतिः।
नरोवाहः देवः सितध्वज पताका विजयते॥
पुरी अल्काधीशो वृहत तनुधारी कुरु दयाम्।
नरेन्द्रानाम् नाथः कठिन दुःख दारिद्र्य दहनम्॥
राजत दिव्य विमान चढ़े,
अति सुंदर कुंडल कानन में।
गण-मध्य विराजत सिद्ध सदा
छवि भाल सजे मणिरत्नन में॥
शिव-भक्ति धनी धनपाल धनी
शिव सों अति प्रीति लिए मन में।
आवहु यक्ष नरेश प्रभो
मम पार्थिव पूजन प्रांगण में॥
शीश मुकुट, गल माल बिराजै,
सुवर्ण-सरीर सुवेश धरैं।
कुबेर धनी, धन-कोष के स्वामी,
गदा अरु शंख सदा कर में॥
शिव-भक्त महान, कृपालु सदा,
रिद्धि-सिद्धि समेत पधारहु यहाँ।
करि ध्यान कुबेर को हे प्रभुजी,
मम पार्थिव पूजन पूर्ण करैं॥
पार्थिव शिव पूजन में श्री कीर्तिमुख ध्यानं-आवाहनम्
ॐ मुखे नैव कीर्तिः हुतवह सदेवा नरवरा।
त्वयादत्तं भोज्यं जगतफलदायी सुखकरा॥
कृते पूजायागे भवयुत भवानी सर्वदा।
धनं धान्यं सौख्यम् परम् सायुज्यं देहि मे॥
भाल विलोचन को प्रकटे,
शिव कोप अनूप प्रचंड भयंकर।
ज्यों ग्रसने मुख को निज धावत,
शैल सुता हँसि दीन्हि उजागर॥
नाम ‘सुकीर्ति’ दियो तबही,
शिव-द्वार सदा रहिहै शिव किंकर।
दीन दयाल कृपा करिये,
मम पार्थिव पूजन में आकर॥
पार्थिव शिव पूजन में श्री सर्प ध्यानं-आवाहनम्
ॐ अनंतद्याज्ञनागाः विपुलफणयुताः मणियुताः।
महादेवा कण्ठे वलयकृत शोभा युत सदा॥
महायोगी रुपान् जगतभयकारी अभयदान।
नमामित्वाम् देवं विरल सरलम् त्वम् विषधरान्॥
एतैत सर्पाः शिवकंठभूषा
लोकोपकाराय भुवं वहन्तः।
भूतैः समेता मणि भूषितांगाः
गृह्णीत पूजां परमा नमो वः॥
कल्याणरुपं फणिराजमग्रं
नाना फणा मंडल राजमानम्।
भक्त्यैक गम्यं जनता शरण्यं
यजाम्यहं नः स्व कुलाभि वृद्धयैः॥
फन-मंडल सोहत है जिनपे,
मणि की छवि राजति उज्ज्वल भारी।
गल-माल सुहावन नागपती,
विष-ज्वाल की है अति रूप सँवारी॥
शिव-ध्यान धरें मन में नित ही,
भव-ताप हरें सब संकट टारी।
करि कै आवाहन आज यहाँ,
मम पार्थिव पूजन हो सुखकारी॥
फनकारत शीश विराजत हैं,
उरमाल सु नाग की सोहै सही।
विष को सुधा करि दै प्रभु को,
भव-बाधा हरैं शिव ध्यानमहीं॥
करि कै सुर-अर्चन वंदन को,
शिव-रूपहिं धारत नाग लही।
तजि के सब मोह भयंकर को,
मम प्राणहिं पावन कीजै सही॥
पार्थिव शिव पूजन में श्री शिव ध्यानं-आवाहनम्
ॐ ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं
रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।
पद्मासीनं समन्तात् स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं
विश्वाद्यं विश्ववन्द्यं निखिलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम्॥
शीश पे गंगा हे कण्ठ भुजंगा
हे कोटि अनंग लजावन वाले।
हाथ त्रिशूल हे नाशक शूल
वही डमरू के बजावन वाले॥
मृगछाल सुशोभित है कटि पे
अरु भक्त की लाज बचावन वाले।
शंकर की महिमा है अपार
ये दानी बड़े ही बड़े भोले भाले॥
भस्म सुशोभित अंग अनूप,
कपाल त्रिशूल महा छवि छाजै।
शीश जटा सिर गंग बहै,
तन पै वाघम्बर सोहत राजै॥
ध्यान धरैं मुनि-सिद्ध सुरेस,
पार्थिव रूप विराजत आजै।
पार्थिव लिंग पधारहु नाथ,
पूजहुँ ध्यान धरौं सब साजै॥
॥ यजमान को आशीर्वाद ॥
आयुद्रोंणसुते श्रियो दशरथे
शत्रुक्षयो राघवे।
ऐश्वर्यं नहुषे गतिश्च पवने
मानश्च दुर्योधने॥
शौर्यं शान्तनवे बलं हलधरे
सत्यञ्च कुन्तीसुते।
विज्ञानं विदुरे भवन्तु भवतां
कीर्तिश्च नारायणे॥
यावत् तोय धरा धरा धर धरा
धारा धरा भूधरा।
यावत् चारु सुचारू चारु चमरं
चामीकरं चामरम्॥
यावत् रावण राम राम रमणं
रामायणे श्रूयताम्।
तावत् भोग विभोग भोगमतुलं
भोगायते नित्यशः॥
आयुष्मान् भव पुत्रवान् भव
चिरं श्रीमान् यशस्वी भव।
प्रज्ञावान् भव भूरि भूति करणैर्
व्यापार दक्षौ भव॥
तेजस्वी भव शत्रुदर्प दहनैर्
दानैकनिष्ठो भव।
श्रीशम्भो भव पादपूजनरतः
सर्वोपकारी भव॥
लक्ष्मीस्ते पंकजाक्षीर्विलसतु भवने
भारती कण्ठदेशे
वर्द्धन्तां बन्धुवर्गाः प्रबलरिपुगणा
यान्तु पाताल मूले।
देशे देशे सुकीर्तिः प्रसरतु भवतां
कुन्दपूर्णेन्दु शुभ्रा
जीवत्वं पुत्रपौत्रैः स्वजनपरिवृतो
भोक्ष्यसे राज्य लक्ष्मीः॥
मन्त्रार्थाः सफला सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः।
शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु, मित्राणामुदयस्तव॥
जब तक धरा मे सुरसरी,
अरु नर्मदा बहती रहे।
जब तक गगन में सूर्य शशि की,
लालिमा लसती रहे॥
जब तक न सागर सुश्क हो,
सृष्टि सृजन चलती रहे।
तब तक जगत यजमान की,
सुख संपदा बढती रहे॥
सुख शांति प्रदान् करें दुर्गा,
दुख दर्द, को चंडी हटाती रहे।
भय शत्रु विनाश करे काली,
लक्ष्मी धन कोष बढ़ाती रहे॥
यश कीर्ति मां शारदा दे हर पल,
विंध्यवासिनी विघ्न मिटाती रहे।
शीतला दीर्घायु निरोग करे,
मां कीर्ति ध्वजा फंहराती रहे॥
विप्रन के पग धोवन से जेहि,
द्वार पे कीचड़ होत है नाहीं।
गर्जन वेद और शास्त्रन के,
ध्वनि से नभ मङ्गल गुंजत नाही॥
स्वाहा स्वधा करके जन पे जन,
आहुति कर्म करावत नाही।
सो घर है श्मशान की भाँति,
तहाँ सुख सम्पत्ति आवत नाही॥
॥ श्रीरस्तु ॥
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श्री हरि हरात्मक देवें सदा, मुद मंगलमय हर्ष।
सुखी रहे परिवार संग, अपना भारतवर्ष॥
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┉ संकलनकर्ता ┉
श्रद्धेय पंडित विश्वनाथ द्विवेदी
‘सनातनी ज्योतिर्विद’
संस्थापक, अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक
(‘हरि हर हरात्मक’ ज्योतिष)
संपर्क सूत्र – 07089434899
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